कुछ शब्दों, मात्राओं और पंक्तियों के
बीज बिखेरती हूँ मैं क्षितिज पर…
सुना है, सभी मन भर टिमटिमाएंगे आज,
आज रात, शोर बहुत होगा छत पर…

बादलों की कुछ बूंदें चुराकर ले जाते हैं ये बीज
इसलिए आसमान में भी अंकुर फूट पड़े हैं,
कोपलें उग आई हैं भावनाओं की,
जिस रोज भी भारी होगा मन
उसी रोज बारिश होगी
और जो शब्द बिखेरे हैं मैंने मीलों
गूंजा बन ओस संग बिछ जाएंगे, आंगन में…

विसंगतियों के घात से मेरे कई बीज
आसमान में अपनी जड़ों को छोड़
निःशब्द हो टूट कर गिरने लगते हैं…
ताकि उन्हें देखने भर से शायद कभी
कुछ मनचाहा मिल सके किसी पपीहे को
और सार्थक हो सके मेरे शब्दों की चुप…

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