देखो कहीं भी देखो
कहीं भी देख सकते हो तुम
कोई पाबन्दी नहीं है

पतंग देखो
या पड़ोस की लड़की
वृक्ष देखो
या सड़क पर दौड़ते वाहन
ख़ुद को देखो
या मटर की फलियाँ
कोई पाबन्दी नहीं है

लेकिन अपनी राय मत दो
देखने और राय देने में फ़र्क़ है

गोभी को गोभी
क़त्ल को क़त्ल
और मत कहो अन्याय को अन्याय
या कविता को कविता

और अगर नहीं रह सकते हो
कहे बग़ैर
तो भटे को शायद भटा
पतंग को शायद पतंग
कीड़े को शायद कीड़ा
सच को शायद सच
और कविता को शायद कविता कहो

ऐसा करने से
शायद बच सकते हो तुम

लेकिन इतना समझ लो
कि बचने
और शायद बचने में फ़र्क़ है

तुम शायद
नहीं भी बच सकते हो।

स्नेहमयी चौधरी की कविता 'जलती हुई औरत का वक्तव्य'

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