भ्रम, सच, भेंट

Poems: Gaurav Bharti

भ्रम

द्वारका सेक्टर-तीन के
तिरंगा चौक ट्रैफ़िक सिग्नल पर
अगरबत्तियाँ बेचती बच्चियाँ
खटखटाती हैं कार के मोटे ग्लास वाली खिड़की
जो कभी नहीं सरकती

मैं डीटीसी बस की एक सीट पर बैठा
खिड़की के उस पार उन्हें देखता हूँ
और सोचता हूँ
कितने भोले हैं ये बच्चे
जिन्हें अब तक यह भ्रम है कि
‘सबका मालिक एक है’

सच

प्रिय!
तुम्हारी सोहबत में
जब से सीखा है मैंने
आँखों को पढ़ना
सच कहूँ-
दुनिया बेहद उदास दिखने लगी है

ट्रेन, मोटर, बस, कार
सहयात्रियों की आँखों में झाँकता हूँ
ये आँखें किसी खिड़की की माफ़िक खुलती हैं
और ले जाती हैं
एक ऐसी दुनिया में
जहाँ मैं इस सच से वाक़िफ़ होता हूँ कि
हर मनुष्य कम से कम एक बार
अपनी ज़िन्दगी में
मरने से पहले मरा है
और जब-जब वह मरा है
तब-तब मरी है आस्था
गिड़गिड़ाते हुए…

भेंट

तुम्हें याद है
हमारी वह पहली बारिश
जिसकी बूँदों को ओढ़कर
सिर्फ़ हम नहीं भीगे थे
कॉलेज के मैदान में
दूर तक पसरी
मुरझायी दूब भी तर गयी थी

बस इतना ही नहीं हुआ था उस दिन
हुआ यूँ था कि
शहर में एक युवा ने
गाँव जी लिया था
एक बच्चा जो अब परिधि का हिस्सा था
तुम्हारी सोहबत में वह
केंद्र बन गया था

तुम्हें पता है
शहर की ट्रेन पकड़ते ही
ज्यों-ज्यों गाँव दूर होते जाता है
व्यक्ति का किरदार बदलने लगता है
ऐसा मेरे साथ भी होता है, और
ऐसा ही होता है
ट्रेनों के जनरल डिब्बे में शहर की तरफ़
सफ़र कर रहे मुसाफ़िरों के साथ
क्योंकि उनकी हरेक गठरियों में
एक उम्मीद बँधी होती है
जिसके सहारे वह नए रंगमंच पर
शानदार अभिनय करता है

बारिश में भीगते हुए
मैं ख़ुद से मिल सका
कितना अच्छा होता है न
ख़ुद से यूँ अचानक भेंट जाना
मानो खोया हुआ कोई खज़ाना मिल गया हो
मानो कोई बोझ उतर गया हो
कुछ देर के लिए ही सही
मानो कोई चिड़िया
पिंजड़े से आज़ाद हो गयी हो
मानो धूप में झुलसी फ़सल खिल गयी हो
मानो परदा गिर गया हो
नाटक ख़त्म हो गया हो…

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