(रूपान्तर: प्रकाश भातम्ब्रेकर)

खोए हुए बालक-सा
प्रजातन्त्र
जो माँ-बाप का नाम भी नहीं बता सकता
न ही अपना पता
और सत्ता भी
मानो नीची निगाहों से रास्ता नाप रही पतिव्रता
अपने पति-सम्भोग के प्रति एकनिष्ठ
यहाँ का हर प्रस्ताव पूँजीवाद का पिट्ठू
कोर्ट-कचहरी-स्कूलों के अलावा
पन्द्रह अगस्त मनता ही कहाँ है?

लाल क़िले की प्राचीर से प्रधानमन्त्री का
राष्ट्र के नाम पैग़ाम
छछोर लौंडों के रेडियो से सुनने में आता है
और छिनाल औरतों की मुँहज़ोरी में—
झरने वाली गाली-ग़लौज़

मैं अपनी बस्ती में लौटता हूँ दफ़्तर से
अनिवार्य झण्डा-वंदन की औपचारिकता के बाद
जबकि मेरी तमाम बस्ती मोर्चा में शामिल होने…

मैं हर एक की राह में
कल्लफ लगे झकाझक वस्त्रों में
मुख्य अतिथि द्वारा फहराए गए
राष्ट्रध्वज की तरह
अपने ही भाई बन्दों से ‘जय भीम’ करते हुए
महसूस करता हूँ
अपनी सिमटी-सिकुड़ी बन्धुता…
और निषेधाज्ञा तोड़कर बन्दी बना मोर्चा
अपने ही भीतर।

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