सुना है

‘Suna Hai’, a nazm by Zehra Nigah

सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है

सुना है शेर का जब पेट भर जाए तो वो हमला नहीं करता
दरख़्तों की घनी छाँव में जाकर लेट जाता है,
हवा के तेज़ झोंके जब दरख़्तों को हिलाते हैं
तो मैना अपने बच्चे छोड़कर
कव्वे के अण्डों को परों से थाम लेती है,

सुना है घोंसले से कोई बच्चा गिर पड़े तो सारा जंगल जाग जाता है

सुना है जब किसी नद्दी के पानी में
बए के घोंसले का गंदुमी रंग लरज़ता है
तो नद्दी की रुपहली मछलियाँ उस को पड़ोसन मान लेती हैं,
कभी तूफ़ान आ जाए, कोई पुल टूट जाए तो
किसी लकड़ी के तख़्ते पर
गिलहरी, साँप, बकरी और चीता साथ होते हैं

सुना है जंगलों का भी कोई दस्तूर होता है

ख़ुदावंदा! जलीलमोतबर! दाना ओ बीना! मुंसिफ़ ओ अकबर!
मिरे इस शहर में अब जंगलों ही का कोई क़ानून नाफ़िज़ कर!

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