कैसा सख़्त तूफ़ाँ था
कितनी तेज़ बारिश थी
और मैं ऐसे मौसम में
जाने क्यूँ भटकती थी

वो सड़क के उस जानिब
रौशनी के खम्भे से
सर लगाए इस्तादा
आने वाले गाहक के
इंतिज़ार में गुम थी

ख़ाल-ओ-ख़द की आराइश
बह रही थी बारिश में
तीर नोक-ए-मिज़्गाँ के
मिल गए थे मिट्टी में
गेसुओं की ख़ुश-रंगी
उड़ रही थी झोंकों में

मैंने दिल में ये सोचा
आब-ओ-बाद का रेला
उसको राख कर देगा,
ये सजा-बना चेहरा
क्या डरावना होगा,
फिर भी उसको ले जाना
आने वाले गाहक का
अपना हौसला होगा

बारिशों ने जब उसका
रंग-ओ-रूप धो डाला
मैंने डरते-डरते फिर
उसको ग़ौर से देखा
सीधा-सादा चेहरा था
भोला-भाला नक़्शा था
रंग-ए-कमसिनी जिस पर
कैसे धुलके आया था
ज़र्द फूल-सा पत्ता
गेसुओं में उलझा था
शबनमी-सा इक क़तरा
आँख पर लरज़ता था
राख की जगह उस-जा
इक दिया-सा जुलता था
मुझ को यूँ लगा ऐसे
जैसे मेरी बेटी हो
मेरी नाज़ की पाली
मेरी कोख-जाई हो
डाल से बँधा झूला
ताक़ में सजी गुड़ियाँ
घर में छोड़ आयी हो
तेज़-तेज़ चलने पर
मैंने उसको टोका हो
हाथ थाम लेने पर
मेरा उसका झगड़ा हो
खो गई हो मेले में
बह गई हो रेले में
और फिर अँधेरे में
अपने घर का दरवाज़ा
ख़ुद न देख पायी हो!

दफ़अतन ये दिल चाहा
उसको गोद में भर लूँ
ले के भाग जाऊँ मैं
हाथ जोड़ लूँ उसके
चूम लूँ ये पेशानी,
और उसे मनाऊँ मैं
फिर से अपने आँचल का
घोंसला बनाऊँ मैं
और उसे छुपाऊँ मैं!

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