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सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा – बचपन
"मैं बहुत ही शरमीला लड़का था। घंटी बजने के समय पहुँचता और पाठशाला के बंद होते ही घर भागता। 'भागना' शब्द मैं जान-बूझकर लिख रहा हूँ, क्योंकि बातें करना मुझे अच्छा न लगता था। साथ ही यह डर भी रहता था कि कोई मेरा मजाक उड़ाएगा तो?"
सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा – जन्म
"मुझे सिर्फ इतना याद है कि मैं उस समय दूसरे लड़कों के साथ अपने शिक्षकों को गाली देना सीखा था। और कुछ याद नहीं पड़ता। इससे मैं अंदाज लगाता हूँ कि मेरी स्मरण शक्ति उन पंक्तियों के कच्चे पापड़-जैसी होगी, जिन्हें हम बालक गाया करते थे। वे पंक्तियाँ मुझे यहाँ देनी ही चाहिए :
एकडे एक, पापड़ शेक;
पापड़ कच्चो, ___ मारो ___
पहली खाली जगह में मास्टर का नाम होता था। उसे मैं अमर नहीं करना चाहता। दूसरी खाली जगह में छोड़ी हुई गाली रहती थी, जिसे भरने की आवश्यकता नहीं।"
सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा – प्रस्तावना
चार या पाँच वर्ष पहले निकट के साथियों के आग्रह से मैंने आत्मकथा लिखना स्वीकार किया और उसे आरंभ भी कर दिया था। किंतु फुल-स्केप...
सत्य के प्रयोग अथवा आत्मकथा
प्रस्तावना
पहला भाग:
जन्म
बचपन
बाल-विवाह
पतित्व
हाईस्कूल में
दुःखद प्रसंग - 1
बापू के प्रति
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि,
तो क्या भजते होते तुमको
ऐरे-ग़ैरे नत्थू खैरे?
सर के बल खड़े हुए होते
हिन्दी के इतने लेखक-कवि?
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि?
बापू, तुम...
मेरे सपनों का भारत
"यदि भारत ने हिंसा को अपना धर्म स्वीकार कर लिया और यदि उस समय मैं जीवित रहा, तो मैं भारत में नहीं रहना चाहूँगा। तब वह मेरे मन में गर्व की भावना उत्पन्न नहीं करेगा। मैं भारत से उसी तरह बंधा हुआ हूँ, जिस तरह कोई बालक अपनी माँ की छाती से चिपटा रहता है; क्योंकि मैं महसूस करता हूँ कि वहाँ मुझे अपनी उच्चतम आकांक्षाओं की पुकार का उत्तर मिलता है। यदि किसी कारण मेरा यह विश्वास हिल जाए या चला जाए, तो मेरी दशा उस अनाथ के जैसी होगी जिसे अपना पालक पाने की आशा ही न रही हो।"
समझौते का कोई प्रश्न ही नहीं
यूरोपीय युद्ध के सन्दर्भ में अहिंसा के महत्त्व पर पूछे गए सवालों के जवाब के रूप में महात्मा गाँधी के लेख 'युद्ध और अहिंसा' किताब में संकलित किए गए हैं.. उन्हीं में से एक लेख प्रस्तुत है जिसमें उन्होंने हिटलर को लिखे गए अपने ख़त के बारे में भी ज़िक्र किया है...



