Tag: Suryakant Tripathi Nirala
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु
बाँधो न नाव इस ठाँव, बंधु!
पूछेगा सारा गाँव, बंधु!
यह घाट वही जिस पर हँसकर,
वह कभी नहाती थी धँसकर,
आँखें रह जाती थीं फँसकर,
कँपते थे दोनों...
बापू के प्रति
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि,
तो क्या भजते होते तुमको
ऐरे-ग़ैरे नत्थू खैरे?
सर के बल खड़े हुए होते
हिन्दी के इतने लेखक-कवि?
बापू, तुम मुर्गी खाते यदि?
बापू, तुम...
प्रेम-संगीत
बम्हन का लड़का
मैं, उसको प्यार करता हूँ।
जात की कहारिन वह,
मेरे घर की है पनहारिन वह,
आती है होते तड़का,
उसके पीछे मैं मरता हूँ।
कोयल-सी काली, अरे,
चाल...
कंजूस और सोना
एक आदमी था, जिसके पास काफ़ी ज़मींदारी थी, मगर दुनिया की किसी दूसरी चीज़ से, सोने की उसे अधिक चाह थी। इसलिए पास जितनी...
राजे ने अपनी रखवाली की
राजे ने अपनी रखवाली की
क़िला बनाकर रहा
बड़ी-बड़ी फ़ौजें रखीं।
चापलूस कितने सामन्त आए।
मतलब की लकड़ी पकड़े हुए।
कितने ब्राह्मण आए
पोथियों में जनता को बाँधे हुए।
कवियों ने...
कविवर श्री सुमित्रानन्दन पन्त
'कविवर श्री सुमित्रानन्दन पन्त' - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
"मग्न बने रहते हैं मोद में विनोद में
क्रीड़ा करते हैं कल कल्पना की गोद में,
सारदा के मन्दिर...

