‘Tagore’, a poem by Sheoraj Singh Bechain

कबीर की सौ कविताएँ
रैदास के
शब्दों का सारा ज्ञान
संगीत की साधना
गीतांजलि का
अद्भुत अवदान
सब एक ओर
सब बेमतलब
यदि मानव
को अछूत करने पर
हुआ न व्याकुल गान।
न्याय की ओर-
गया नहीं ध्यान।
जिसके लिए
नवाजा जाता
उसे दिया अज्ञान।
वह स्वीकारोक्ति ठाकुर का
वह अनमोल बयान
कि “मैं जिन-,
अछूतों के आँगन तक नहीं जा सका,
उनके घर भीतर की बात कैसे जान पाता
बिन समझे, बिन जाने क्या कहता-क्या गाता?”
वही सत्य
वेदना वही
वही टैगोर के संगीत का सरगम है।
वह हिकारत
की बू और राहत का स्वर है
सामाजिक ज़ख़्मों
का अचूक मरहम है
बेज़ुबान की ज़ुबाँ है
बेदम का दम है
एक अछूत-भारत की
टैगोर के लिए दुआ
किस श्रद्धांजलि से कम है।

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Book by Sheoraj Singh Bechain:

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श्यौराज सिंह बेचैन
जन्म : 5 जनवरी 1960, गाँव नदरोली, बदायूँ (उ.प्र.) शिक्षा: एम.ए., बी.एड. (हिन्दी), पीएच. डी., डी. लिट्. रचनाएँ: मेरा बचपन मेरे कन्धों पर (आत्मकथा); चमार की चाय, क्रौंच हूँ मैं, नयी फसल (कविता संग्रह); सामाजिक न्याय और दलित साहित्य, हिन्दी दलित पत्राकारिता पर पत्रकार अम्बेडकर का प्रभाव (शोध-प्रबन्ध).