वो उतना ही पढ़ना जानती थी
जितना अपना नाम लिख सके

स्कूल उसको मज़दूरों के काम
करने की जगह लगती थी
जहाँ वे माचिस की डिब्बियों
की तरह बनाते थे कमरे,
तीलियों से उतनी ही बड़ी खिड़कियाँ
जहाँ से कोई
ज़रूरत से ज़्यादा साँस न ले सके!

पता नहीं क्यों
एक ख़ाली जगह और छोड़ी गयी थी
जिसका कोई उद्देश्य नहीं,
इसलिए उसका उपयोग
हम अन्दर-बाहर जाने
के लिए कर लेते हैं

वो माचिस की डिब्बियों के
ऊपर और डिब्बिया नहीं बनाते
क्योंकि उन्हें लगता था
कहीं वे सूरज तक न पहुँच जाएँ?
इसीलिए नहीं बनाते उन डिब्बियों
के सहारे सीढ़ियाँ,
लेकिन नज़र से बचने के लिए
छोटा टीका ही काफ़ी होता है

फिर भी,
दीवारों पर पोता जाता था
काला आयत
जिस पर अलग-अलग बौने
लकड़ी को काटने की जगह
समय को काटने के लिए
सफ़ेदी पोतते थे
और उतना ही पढ़ाते रहे
जितना वो अपना नाम लिख सके!

प्रताप सोमवंशी की कविता 'लड़की चाहती है'

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मंजुल सिंह
नाम- मंजुल सिंह निवास- ग़ाज़ियाबाद (उ.प्र.) शिक्षा- सिविल इंजीनियरिंग एम.ए. (हिंदी) चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय (मेरठ), यू.जी.सी (नेट/जे.आर.एफ-हिंदी),वर्तमान में अध्यनरत

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