बीच-बीच की
ये मुलाक़ातें
मेरी उम्र के पन्नों पर ऐसे ही सजी हैं—
जैसे बच्चे अपनी पोथी में
चमकीली पन्नी,
साँप की केंचुल
और फूल की पँखुरियाँ रखते हैं।

प्यार?
सच क्या वह ललक ही प्यार है?
तो फिर उसको क्या कहते हैं
जो अनजाने अँधेरे में
भीतरी तहों में पहुँच जाता है
और हरेक छिद्र को रस में भर देता है?

इस बार मिलोगी तो पूछूँगा!