पर्णपाती वृक्षों की भाँति मैं,
अपनी बौझक मुस्कान की पत्तियों
को गिरा दूँगा—तुम्हें देखकर,
रेहन पर रख दूँगा अपनी सारी कोशिकाओं को
तुम्हारे अधरों के गुरुत्वाकर्षण से
बचने के लिए;
जो किसी भी क्षण मुझे वाष्पित कर जाएँगी
तुम्हारी धधकती हुई कामुकता से
फिर मेरी चेतना ऊर्ध्वपातित हो जाएगी
और फिर कामनाएँ अबोध होने का
स्वाँग रचाएँगी तुम्हारे नयन की परिधि में,
मनोदैहिक रेशों में फँसकर
संकुचित कर लूँगा अपने हृदय को
उल्कापिंड की भाँति तुम्हारी काया की,
परिक्रमा करके निर्वात में विलीन हो जाऊँगा
या तुम्हारे ज़ेनटैंगल डूडल में
अपने अस्तित्व की परिकल्पना कर लूँगा।

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