आँखें मुझे तलवों से वो मलने नहीं देते
अरमान मिरे दिल के निकलने नहीं देते

ख़ातिर से तिरी याद को टलने नहीं देते
सच है कि हमीं दिल को सँभलने नहीं देते

किस नाज़ से कहते हैं वो झुँझला के शब-ए-वस्ल
तुम तो हमें करवट भी बदलने नहीं देते

परवानों ने फ़ानूस को देखा तो ये बोले
क्यूँ हम को जलाते हो कि जलने नहीं देते

हैरान हूँ किस तरह करूँ अर्ज़-ए-तमन्ना
दुश्मन को तो पहलू से वो टलने नहीं देते

दिल वो है कि फ़रियाद से लबरेज़ है हर वक़्त
हम वो हैं कि कुछ मुँह से निकलने नहीं देते

गर्मी-ए-मोहब्बत में वो हैं आह से माने
पंखा नफ़स-ए-सर्द का झलने नहीं देते..

Previous articleलीडर-लाला
Next articleपुलिस की निंदा क्‍यों की जाती है?
अकबर इलाहाबादी
अकबर इलाहाबादी (1846-1921) को उर्दू में हास्य-व्यंग का सबसे बड़ा शायर माना जाता हैं। यह पेशे से इलाहाबाद में सेशन जज थे।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here