“जब तक इंसान खाना खाएगा, तब तक उसको तीन चीज़ों की ज़रूरत रहेगी ही। खाने की, आग की और चाक़ू की। खाना किसान उगाता है, आग सरकार बनाती है, चाक़ू लोहार बनाता है और हम चाक़ू में धार लगाते हैं…”

तेजा का पूरा बचपन अपने बाप से यह सुनते हुए और चाक़ू तेज़ करने के दौरान उड़ने वाली चिंगारी को देखते हुए बीता था। तेजा के बाप ने धार लगाने के काम को उसके सामने एक ऐसे तिलिस्म की तरह रखा जिससे तेजा एक उम्र हो जाने के बाद भी नहीं निकल पाया था। पत्थर पर रगड़ खाते हुए चाक़ू से उड़ती हुई चिंगारी हवा में जल-बुझने के बाद उसके भीतर जल उठती थी और उसकी रूह को रौशन रखती थी। पत्थर पर चाक़ू के टकराने की और घिसे जाने की आवाज़ उसे दुनिया के तमाम शोरो-गुल से महफ़ूज़ रखती थी। तेजा को हमेशा चाक़ुओं में और तेज़ और तेज़ हो जाने की उम्मीद नज़र आती थी लेकिन उसकी बीवी को चाक़ुओं में खाने के सिवा कुछ नज़र न आता था। रात का खाना कैसे होगा, यह इस बात पर मुनहसिर था कि तेजा दिन में कितने ज़ियादा चाक़ुओं को तेज़ी बख़्शता है। जितने ज़ियादा चाक़ू, उतना अच्छा खाना और पिछले कई दिनों से तेजा के घर में नमक-रोटी से ज़ियादा कुछ नहीं पका था। हर पुराने काम की तरह इस काम में भी अब बहुत फ़ायदा नहीं था।

तेजा का बाप जिन दिनों चाक़ू तेज़ करता था, उन दिनों में लोग चाक़ू तेज़ करवाने वाले का इंतज़ार किया करते थे। तेजा का बाप उन लोगों के दरमियान किसी त्योहार की तरह पहुँचता था। किसी मोहल्ले में जाने के बाद वहाँ के तक़रीबन हर घर का कम से कम एक चाक़ू तेज़ करने के बाद ही उसे फ़ुर्सत मिलती थी। उस वक़्त उसके इर्द-गिर्द जो भीड़ जमा होती थी, उसे देखकर लगता था कि वो चाक़ू नहीं तेज़ कर रहा हो बल्कि कोई करतब दिखा रहा हो— जैसे लोग लोहे के चाक़ू-छुरियों के बदले चाँदी के चमकते हुए चाक़ू और छुरियाँ लेकर जाते हों। उसकी मक़बूलियत दरअस्ल उसके साथ हुई नाइंसाफ़ी का हर्जाना थी।

तेजा के बाप ने अपने क़बीले के ख़िलाफ़ जाकर शादी की थी। क़बीले के लोग उसे लोहा पिघलाने वाली भट्टी में झोंकने के लिए तैयार बैठे थे, जिसकी वजह से उसे शहर भागना पड़ा था। अपने क़बीले से भागते हुए उसने एक ऐसा पत्थर चोरी कर लिया था जिस पर रगड़कर चाक़ुओं पर धार लगायी जा सके और भूख की धार को कम किया जा सके। क़बीले वालों को उस छोटे-से पत्थर की चोरी से कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा लेकिन तेजा के बाप के लिए वह पारस पत्थर हो गया। उस पत्थर से कोई लोहा सलीक़े से छू जाए तो उसमें धार लग जाती थी। कुछ जादू उस पत्थर में था और कुछ हुनर उसके हाथों में। वह दस से तीस डिग्री के बीच के एंगल पर चाक़ुओं को एक ख़ास अन्दाज़ में उस पत्थर पर रगड़ता था। चाक़ू के पत्थर पर रगड़ खाने से जो आवाज़ पैदा होती थी, उससे वो आसानी से अन्दाज़ा लगा लेता था कि चाक़ू तेज़ हो रहा है या नहीं। एक बार जब वह मुतमइन हो जाता कि चाक़ू पर धार लग चुकी है तो वह उसे छूकर देखता— कई बार तो उसकी उँगलियों से ख़ून निकल आता था। देखने वाले चाक़ू, चाक़ू की धार और तेजा के बाप का ख़ून देखते रह जाते। तेजा के बाप को मालूम था कि दुनिया में मौजूद हर क़िस्म के फ़न से पुराना है धार लगाने का फ़न। पत्थरों से नुकीले और धारदार हथियार बनाने का फ़न इंसानी तहज़ीब की बुनियाद में शामिल है। मुसव्वीरी, शायरी और मौसिक़ी ये सब उसके बाद की चीज़ें हैं। इसलिए वह धार लगाने के इस काम को कलाकारी से ज़रा कम नहीं समझता था। शायद यही वजह थी कि एक बार जिसने उससे चाक़ू तेज़ कराया वो किसी और धार वाले के पास कभी नहीं गया।

तेजा के बाप के ग्राहक बढ़ते गए और बढ़ते-बढ़ते इतने हुए कि उसे एक साइकिल ख़रीदनी पड़ी। साइकिल और सीट के बीच मौजूद डण्डे में उसने एक पहियानुमा पत्थर फ़िट करवा लिया जिसे साइकिल के पैडल से घुमाया जा सकता था। अब पत्थर घूमता था और तेजा का बाप चाक़ू को एक ख़ास एंगल में उस पत्थर से लगाए रखता था, चिंगारियाँ निकलती रहती थीं, चाक़ू तेज़ होता रहता था और घर चलता रहता था।

कई बरस के बाद एक बार दीवाली की एक रात जब सारे शहर में लोग पटाखे और फुलझड़ियाँ जला रहे थे तो तेजा को भी आतिशबाज़ी करने का दिल हुआ। उस रात उसके बाप ने लगातार बहुत देर तक साइकिल चलायी और तेजा एक बेकार पड़े हँसिये को साइकिल पर लगे पत्थर पर घिसते हुए उसके लोहे में मौजूद चिंगारियों को आज़ाद करता रहा। उसका बाप तब तक साइकिल चलाता रहा जब तक हँसिये में मौजूद सारा लोहा चिंगारी नहीं हो गया!

तेजा के पास अपने बाप की साइकिल और जज़्बा दोनों था लेकिन बदलती हुई दुनिया, जिसमें चीज़ों या रिश्तों के ख़राब होने पर उन्हें ठीक करवाने की जगह फेंक देने का रिवाज आम होता जा रहा था, उस दुनिया में उसकी ज़रूरत कम होती जा रही थी। लोग चाक़ू की धार के ख़राब होने पर तेजा के आने का इंतज़ार नहीं करते थे, वो मॉल जाते और महीने के राशन के साथ नया चाक़ू ले आते। तेजा को यह पता था कि चाक़ू बनाने का काम भी अब बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ ही कर रही हैं और कम्पनियों के बनाए चाक़ू स्टील के होते हैं, जिन पर धार लगवाने की ज़रूरत नहीं पड़ती है। उन्हें उनकी धार ख़राब होने पर फेंक दिया जाता है। वो तिलिस्म जो उसने कभी तोड़ने की कोशिश नहीं की, वो तिलिस्म अब वक़्त तोड़ रहा था। इससे पहले कि वो तिलिस्म पूरी तरह टूटता, उसने चाक़ू पर धार लगाने का काम छोड़ दिया।

तेजा ने सड़कों पर घूम-घूमकर आती-जाती बसों में कच्चे नारियल के काशे बेचने शुरू कर दिए। नारियल को तोड़ने के बाद वो बड़े सलीक़े के साथ एक चाक़ू से नारियल के बराबर-बराबर काशे काटता। जितनी आमदनी चाक़ू पर धार लगाने से होती थी, नारियल बेचकर वह उससे थोड़ा ज़ियादा ही कमा लेता था। जब वह नारियल को चाक़ू से काटता था तो कभी-कभी उसे लगता था कि अभी नारियल से चिंगारी निकल पड़ेगी— ठीक वैसे ही जैसे घूमते हुए पत्थर से चाक़ू के छू जाने पर निकलती है। लेकिन सख़्त से सख़्त नारियल होने के बावजूद वो चाक़ू से चिंगारी नहीं निकाल सकता था। नारियल के खट-खट करके कटने और टूटने की आवाज़ में भी वो सुरीलापन नहीं था जो रक़्स करते हुए पत्थर पर चाक़ू के रगड़ खाने पर निकलने वाली आवाज़ में होता था। चिंगारी और हरर्र-हर्रर की आवाज़ कहीं नहीं थी और उनकी ग़ैर मौजूदगी से बनी जगह में एक उदासी रहने लगी थी।

अभी इस नये काम को अंजाम देते हुए बमुश्किल एक हफ़्ता हुआ होगा जब नारियल काटने वाला चाक़ू ख़राब हो गया और उससे नारियल का एक काशा काटना भी नामुमकिन हो गया। अभी दिन आधे से भी कम ख़र्च हुआ था। तेजा ने वहीं पास में मौजूद फ़्रूट सलाद बेचने वाले से चाक़ू माँगा लेकिन इस डर से कि नारियल काटने से चाक़ू जल्दी ख़राब हो जाता है, सलाद वाले ने तेजा को चाक़ू नहीं दिया। हालाँकि तेजा अगर फ़्रूट सलाद बेच रहा होता तो भी फ़्रूट सलाद वाला उसे चाक़ू नहीं देता। तेजा ने बचे हुए नारियल उठाए और इस इरादे से कि घर जाकर चाक़ू तेज़ करके वो वापस यहीं आ जाएगा, वहाँ से चल पड़ा।

तेजा का घर दिल्ली के एक ऐसे स्लम में था जहाँ नये झोपड़ों या घरों के इमकान पूरी तरह ख़त्म होने के बावजूद, नये-नये झोपड़े लगातार बन रहे थे। हर नया झोपड़ा अपने पहले वाले से छोटा होता था। इसी स्लम में एक झोपड़े के आगे तेजा की साइकिल खड़ी थी। वो साइकिल ही इस बात का इशारा थी कि वो झोपड़ा तेजा का था। तेजा ने आते ही साइकिल पर नज़र डाली। पहले से ही पुरानी हो चुकी साइकिल पर हफ़्ते भर में इतनी धूल जम गयी थी कि वो मिट्टी की बनी एक बड़ी-सी खिलौना साइकिल मालूम पड़ती थी। तेजा ने नारियल का टोकरा घर के अन्दर रखा और वह एक कपड़ा उठाकर लाया। उस कपड़े में खिलौना साइकिल को असली साइकिल में बदलने का जादू था। तेजा के पीछे-पीछे उसके झोपड़े को घर बनाने वाली जादूगरनी भी बाहर आ गयी। उसकी गोद में डेढ़-दो साल का एक लड़का भी था। लड़का के हाथ में वही पारस पत्थर था जिसे उसका दादा क़बीले से चुराकर लाया था।

“का हुआ…बड़ी जल्दी आ गए?”

“नारियल कट नहीं रहा था चाक़ू से… धार लगा के वापस चले जाएँगे…” साइकिल को कपड़े से पोंछते हुए तेजा ने उसे जवाब दिया।

तेजा के हाथ तेज़ी से चल रहे थे और मिट्टी की खिलौना साइकिल तेज़ी से असली साइकिल में बदल रही थी। तेजा की बीवी वहीं खड़ी उसे देख रही थी। धूल हटने से साइकिल चमकी या नहीं, तेजा की आँखें ज़रूर चमक गयीं। वो वापस झोपड़े में गया और नारियल के टोकरे में पड़ा चाक़ू उठा लाया। वापस आकर उसने साइकिल को स्टैण्ड पर खड़ा किया और उसकी सीट पर बैठकर पैडल मारने लगा। पत्थर घूमने लगा। तेजा पहले तो देर तक उस घूमते हुए पत्थर को देखता रहा फिर उसने बेहद हल्के हाथों से चाक़ू की धार को पत्थर पर लगाया। चिंगारी फूट पड़ी।

पीले-पीले रौशनी के टुकड़े हवा में बिखरने लगे। जुगनुओं को बनाने की तरक़ीब भी शायद यही हो। तेजा ख़ुश था। चिंगारियों को देखकर उसकी बीवी की कमर पर टिका हुआ उसका डेढ़ साल का बेटा भी हुमक उठा। चिंगारियाँ उड़ती रहीं, चाक़ू में धार लगती रही। बेटा हुमकता रहा। तेजा ख़ुश होता रहा और तेजा की बीवी यह सब देखती रही।

तेजा पैडल घुमाते-घुमाते रुककर बीच में चाक़ू को भी देख रहा था और जब वह मुतमईन हो गया कि चाक़ू तेज़ हो चुका है तो उसने बेहद हल्के हाथों से अपना अँगूठा चाक़ू की धार पर फिराया। अँगूठे की खाल चाक़ू छूते ही कट गयी। तेजा की ख़ुशी में कुछ और इज़ाफ़ा हुआ। उसने चाक़ू अपनी बीवी को दिया।

“दो पैसा कम कमाएँगे लेकिन काम करेंगे यही..। अपने मन का। बाप-दादा का काम…” बीवी को चाक़ू देने के बाद तेजा ने कमर को कुछ ऐसा झटका दिया कि साइकिल स्टैण्ड से उतर गयी और वह पैडल मारते हुए वहाँ से निकल गया।

“निकम्मे! तू कमाता ही दो पैसा है…” बीवी ने तेजा की पीठ पर आवाज़ का पत्थर मारा। लेकिन तेजा ने उस चोट की परवाह नहीं की और आगे निकलता गया।

जेब में आधा दिन लिए तेजा दिल्ली की एक ऐसी कॉलोनी में पहुँचा जहाँ वह दो महीने से नहीं गया था। कॉलोनी में घुसते ही उसे कॉलोनी की फ़ज़ा कुछ बदली-बदली सी लगी। अप्रैल के शुरूआती दिन थे, सो धूप ऐसी भी नहीं थी कि लोग गली में आएँ ही न। बहुत सारे घरों के ग्राउण्ड फ़्लोर पर दुकानें थीं जो बन्द थीं। कुछ घरों और दुकानों के बाहर नये-नये नारंगी झण्डे टँगे हुए थे। वो पहले भी आ चुका था इन गलियों में लेकिन पहले कभी ऐसे झण्डे उसे नहीं दिखे। तेजा ने झण्डों को देखकर सोचा कि वो शायद किसी पार्टी के झण्डे होंगे। ख़ैर उसे किसी पार्टी से क्या। कोई किसी पार्टी का हो, खाना तो खाएगा ही! अब अगर वो चाक़ू तेज कराने आएगा तो उसे करना ही चाहिए। फ़िलहाल वो जिस गली के सामने खड़ा था, उसमें कुत्ते के अलावा कोई न था। कुत्ता खाना खाता था लेकिन उसे खाने के लिए किसान का, आग के लिए सरकार का, चाक़ू के लिए लोहार का, और चाक़ू में धार के लिए तेजा का मुँह नहीं देखना था। कुत्ता तेजा का मुँह भी खाने के लिए ही देख रहा था कि शायद कुछ मिल जाए। तेजा भी सुनसान गली को देखते हुए आवाज़ लगाने की सोचने लगा कि शायद कुछ ग्राहक मिल जाएँ।

“धार वाला… चाक़ू, छुरियाँ, हँसिये तेज़ करा लो… धार वाला…”

कोई दरवाज़ा नहीं खुला। धूप में कोई नया साया नहीं बना। हाँ वो कुत्ता जो गली के मुहाने पर तेजा का मुँह देख रहा था, वो भी अपने साये समेत गली से बाहर की धूप में जा चुका था। तेजा को लगा कि दोपहर का वक़्त है, धूप तेज़ नहीं तो क्या, धूप तो है, घरों की खिड़कियाँ बन्द होंगी और उसकी आवाज़ अन्दर तक नहीं पहुँच रही होगी। आवाज़ उसके पास पहले से थी, उसने अपने अन्दर आवाज़ के लिए जोर पैदा किया।

“धार वाला… चाक़ू, छुरियाँ, हँसिये तेज़ करा लो… धार वाला…”

लोगों को गली में अपनी मौजूदगी का एहसास दिलाते हुए वो गली के आख़िर तक आ गया। तेजा वहाँ से मोड़ मुड़कर दूसरी गली में जाने वाला ही था कि पीछे से आवाज़ आयी।

“ओ धार वाले… रुकना भाई..।”

यह एक मर्दाना आवाज़ थी। अमूमन चाक़ू वगैरह तेज़ कराने के लिए घर के लोग बच्चों को या औरतों को भेज देते थे। लेकिन यह एक नौजवान था। पहले तो तेजा को हैरानी हुई कि एक नौजवान दोपहर को घर में कैसे मौजूद है। फिर उसे याद आया कि उसने तीन दिन पहले ही तो एक बस में नारियल बेचते हुए किसी को यह कहते हुए सुना था कि मुल्क में बेरोज़गारी बढ़ी हुई है। ऐसे में एक बेरोज़गार लेकिन अच्छे घर का नौजवान घर ही में बैठेगा। घर में बैठेगा तो दूध ब्रेड लाएगा, सब्ज़ी वगैरह लाएगा और चाक़ू पर धार भी लगवाने आएगा। तेजा ठहर गया और साइकिल को धार लगाने के लिए तैयार करने लगा। तब तक वो आदमी तेजा के क़रीब आ गया। उसके पास एक ज़ंग लगी हँसिया थी। तेजा को हँसिया देखकर बड़ी हैरानी हुई। शहरों में अब कौन हँसिये का इस्तेमाल करता है आख़िर। चाक़ू हँसिया तेज़ करा लो.. यह जुमला तो वो इसलिए बोलता है क्यूंकि उसे बचपन से ही इस जुमले की आदत पड़ी हुई है। विरासत में उसे अपने बाप से साइकिल के साथ-साथ ये जुमला भी मिला था।

“बड़े दिन बाद आए…।” उस आदमी ने तेजा से कहा।

“बड़े दिन बाद आए…।” यह एक ऐसा जुमला है जो अगर किसी से कहा जाए तो उसे लगता है कि उसका इंतज़ार किया जा रहा था। उस आदमी से तेजा ने जब यह जुमला सुना तो उसे भी ऐसा ही लगा। उसका इंतज़ार किया जा रहा था यानी अभी इस दुनिया में उसकी ज़रूरत है। तेजा कुछ मुतमईन हुआ। उसने उस आदमी का हँसिया लिया और उस पर धार लगाने लगा। चिंगारियाँ उड़ने लगीं। तेजा मुस्कुराने लगा। हँसिये पर धार लगाते-लगाते बीच-बीच में वो और आवाज़ लगा देता—

“धार वाला… चाक़ू, छुरियाँ, हँसिये तेज़ करा लो… धार वाला…”

ज़ंग लगे हँसिये का किनारा मुस्कुराने लगा और उसके दाँत चमकने लगे। तेजा ने बहुत हल्के हाथों से हँसिये की धार को परखा। शानदार। उसने हँसिया उसके मालिक को सौंपने के लिए जब नज़रें उठायीं तो पता चला कि सात-आठ लोग और आ चुके थे। सभी के पास चाक़ू, हँसिया जैसे औज़ार मौजूद थे। एक शख़्स के पास तो तलवार भी थी। तेजा ने ग़ौर किया कि उस पूरी भीड़ में एक भी औरत नहीं थी, एक भी बच्चा नहीं। सिर्फ़ मर्द थे। इतने सारे लोगों को एक साथ देखकर वो घबरा गया।

“तलवार पे धार करने का कितना लेगा…” तलवार तेजा की तरफ़ बढाते हुए उस शख़्स ने कहा।

बाप का काम सम्भालते हुए तेजा को दस-बारह बरस हो गए थे। लेकिन उसने कभी तलवार पर धार लगाने का काम नहीं किया था। इसलिए तलवार पर धार लगाने की उजरत क्या होनी चाहिए, वो ठीक-ठीक नहीं बता सकता था। उसने तलवार को ग़ौर से देखा और अन्दाज़ा लगाया कि इसमें दस-ग्यारह चाक़ू तो बन सकते हैं। एक चाक़ू के वो पाँच रुपये लेता है इसलिए तलवार के पचास-पचपन रुपये होने चाहिए। हाँ पचपन रुपये ठीक है उसने सोचा।

“चालीस रुपये होंगे… तलवार है न…” तेजा ने कहा।

जो रेट उसने ज़हन में तय किया था, ज़बान को ज़ियादा लग रहा था। ग़रीबी ने उसकी ज़बान का कुछ ऐसा रियाज़ कराया था कि वो आज तक कभी वाजिब मेहनताना माँग ही नहीं सका था।

“अच्छे से धार लगा… बकरे की गर्दन पे मारूँ तो ऐसा न हो कि तलवार वहीं अटक जाए… काम अच्छा किया तो पचास दूँगा…” आदमी ने यह कहने के बाद अपने होंठों पर अपनी ज़बान यूँ फिरायी जैसे वो ज़बान पर धार लगा रहा हो।

तेजा ने ख़ुशी-ख़ुशी तलवार ली और धार लगाने लगा। तलवार के बाद कुछ चाक़ुओं और हँसियों पर भी धार लगायीं। आख़िरी आदमी के चाक़ू पर जब वो धार लगा रहा था, उस आदमी ने उसे बताया कि दायीं तरफ़ इस गली से तीन गली छोड़कर जो गली पड़ती है, वहाँ उसे और ग्राहक मिल जाएँगे। कड़ी से कड़ी जुड़ रही थी, ग्राहक से ग्राहक बन रहे थे। तेजा को अपने बाप की याद आयी, हो सकता है अपने बाप की सी मक़बूलियत उसे भी हासिल हो जाए। तेजा ने धार लगाकर उस ग्राहक को चाक़ू वापस दिया, पैसे लिए और शुक्रिया अदा करते हुए उस गली की तरफ़ निकल गया।

जाने क्या हिसाब था इन झण्डों का, तेजा गली के मुहाने पर ठहरकर सोचने लगा। इस गली में भी उसे कुछ झण्डे नज़र आए। बस रंग अलग था इस गली में। हरे रंग के ये झण्डे भी नये कपड़ों के बने लग रहे थे। तेजा को लगा कि ये गली भी किसी नेता के क़ब्ज़े में गयी। जितने नेता, उतनी पार्टी, उतने झण्डे। ख़ैर उसे क्या किसी पार्टी का क़ब्ज़ा हो इस गली में, उसे धार लगाने से मतलब है। पिछली गली में जिस शख़्स ने उसे इस गली में भी आने का मशवरा दिया था, वह भी उसे नज़र आया। घर में घुसते हुए उस आदमी की नज़र तेजा से टकरायी। तेजा ने वहीं खड़े उस हाथ जोड़कर उस आदमी का शुक्रिया अदा किया। लेकिन वो तेजा के शुक्रिया का कोई जवाब दिए बिना एक घर में चला गया। तेजा ने साईकल के पैडल पर दबाव बढ़ाया और गली में आगे बढ़ चला।

“धार वाला… चाक़ू, हँसिया, तेज़ करा लो… धार वाला…”

तेजा ने बस एक ही आवाज़ लगायी कि उससे दस क़दम की दूरी पर मौजूद एक दुकान से नौ-दस लोग बाहर निकल आए। सब के पास एक ऐसा आहनी टुकड़ा मौजूद था जिस पर धार लगाने की ज़रूरत थी। एक साथ इतने लोगों को अपना इंतज़ार करते हुए देख तेजा का भरोसा इस बात पर और पक्का हो गया कि दुनिया को अभी उसकी ज़रूरत है। एक दिन में इतना काम कभी नहीं मिला था उसे। उसे नारियल बेचने के काम को छोड़ देने का अपना फ़ैसला बिलकुल ठीक लगा। उसने बारी-बारी सबके चाक़ुओं, हँसियों और दूसरे धारदार औज़ारों पर काम किया और उन्हें उनका हुस्न वापस किया। जेब में दिन का आख़िरी पहर था जिसे ख़र्च करके वह जितना कमा सकता था, कमाया और ढलते हुए सूरज की ओर एक नज़र डालकर घर चल पड़ा। ढलते सूरज को देखकर उसने सोचा कि आज दिन भर चाक़ुओं पर धार लगाने से जितनी चिंगारियाँ निकली हैं, उन्हें अगर इकठ्ठा किया जाए तो डूबते सूरज जैसा एक सूरज तो बन ही जाएगा।

तेजा जब घर पहुँचा तो उसके हाथ में सब्ज़ियों का एक थैला था। उसने थैला बीवी को दिया और वहीं ज़मीन पर फैले कटे-फटे एक बिस्तर पर लेट गया। उसका बेटा वहीं बिस्तर पर बैठा अपने दादा के पारस पत्थर से खेल रहा था। उस थैले में हरी सब्ज़ियों के बीच तेजा की बीवी की हरी-भरी ख़ुशी भी दबी हुई थी जिसे वह थैले से सब्ज़ियाँ निकलते हुए पा गयी। वह समझ गयी कि तेजा का दिन अच्छा गया।

“रोज़ गाली खा के जाया करो हम से… दिन ऐसे ही अच्छा जाएगा..।” उसने मुस्कुराते हुए कहा।

“सही कह रही हो… रोज़ गाली दिया करो। धार लगाने पे चाक़ुओं से रोज़ जितनी चिंगारी निकलती है न… जब तक रोज़ उतना न कमाने लगें… तब तक गाली दो…”

“इतना कमाना है तुमको…?”

“और क्या… इतना कमाएँगे कि खज़ाना बना देंगे… फिर उसकी सिकोरिटी में लगा देंगे तुमको!” तेजा ने मुस्कुराते हुए कहा।

“हमको…?” बीवी ने हैरान होकर कहा।

“और क्या.. खज़ाना की सिकोरिटी नागिन ही तो देखती है…” यह कहकर तेजा ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगा।

“बहुत कमीना हो तुम…” बीवी ने एक बनावटी चिढ़ के साथ हल्के हाथों से तेजा को मारते हुए कहा।

तेजा ने उसका हाथ बीच में ही थाम लिया और अपनी तरफ़ खींच लिया। बीवी के पास जो हरी-भरी ख़ुशी थी, उसकी हरियाली अब दोनों के दरमियान फैलने लगी।

एक मुकम्मल दिन और एक मुकम्मल रात कैसी होती है अगर यह सवाल तेजा से पूछा जाता तो यक़ीनन वो कल के दिन और कल की रात का ही नाम लेता। वो चाहता था कि अगला दिन भी वैसा ही हो।

इसलिए अगले दिन काम पर जाने की एक अलग ही जल्दी थी उसमें। साइकिल पर जादू करने वाला कपड़ा मारकर वह सीट पर बैठा ही था कि उसकी बस्ती में रहने वाले एक कबाड़ी ने उसका रास्ता रोक लिया।

“कहाँ जा रहे भैया… दंगा हो गया पूरा सहर में.. काटे जा रहे हैं लोग एक दूसरे को… पूरा सहर कबाड़ा हो गया है…” कबाड़ी ने कहा और आगे बढ़ गया।

तेजा कुछ देर तक साइकिल पर ही बैठा रहा और कबाड़ी को जाते हुए देखता रहा। तेजा का सारा मूड ख़राब हो गया। कबाड़ी वहीं पास में मौजूद अपने घर में घुस गया। तेजा ने साइकिल की सीट से उतरकर साइकिल को यूँ धक्का दिया कि वो गिरते-गिरते एक झोपड़े की दीवार पर टिक गयी।

“क्या रे ऊपर वाले… एक दिन मेरा धन्धा अच्छा क्या चल गया… तो तुझसे देखा नहीं गया…” तेजा आसमान की ओर देखकर चीख़ पड़ा। तभी तेजा को अहसास हुआ कि कोई पीछे से उसकी पैंट खींच रहा है। तेजा मुड़ा तो उसका डेढ़ साल का बेटा उसके सामने था।

“पा.. पत्थल…” बेटे ने पारस पत्थर तेजा की ओर बढ़ाया। पत्थर को देखकर तेजा को ग़ुस्सा आ गया। बहुत सारे चाक़ू जिनमें वह धार नहीं लगा पाया था, उसकी चिंगारियाँ तेजा के अन्दर दबी हुई थीं। तेजा ने बेटे के हाथ से वो पत्थर छीना और उसे एक ज़ोरदार तमाचा मारा। बच्चा ज़मीन पर गिरकर रोने लगा और तेजा ने पारस पत्थर को कबाड़ी के झोपड़े पर दे मारा। वो पत्थर झोपड़े के पास पड़े एक पत्थर से टकराया और उनसे कुछ चिंगारियाँ निकलीं।

नोट: उन्वान अरुण कमल जी की एक नज़्म से लिया गया है

Book by Swapnil Tiwari: