है मोक्ष कहाँ है पाप पुण्य,
सब विधि विधान परिणाम शून्य।
जब जब भी रक्त बहेगा अब,
तब तब इन्सां कहेगा अब

तू कहाँ हुआ निस्तेज पड़ा,
अर्जुन अपना गांडीव उठा।

वो देख, हुआ है हाहाकार,
मानवता होती शर्मसार,
पहचान अपने गांडीव का मोल,
तू अपने यश को बहा या घोल,

अपना सब यश तू आज लूटा,
अर्जुन अपना गांडीव उठा।

फिर देख आज संग्राम हुआ,
नारी का फिर अपमान हुआ,
इस बार मौन तुम रहना मत,
सब देख देख सब सहना मत,

उठ कर तू क्षत्रिय धर्म निभा,
अर्जुन अपना गांडीव उठा।

तू मानव है अवतार नहीं,
ये राजाओं की सरकार नहीं,
क्यूँ लिए खड़ाऊ फिरता है,
क्या बची प्रचंड तलवार नहीं,

सूर्य सी ज्वाला आज जगा,
अर्जुन अपना गांडीव उठा।

नायक है, अपनी भूमिका पहचान,
शत्रु कांपे कुछ ऐसा ठान,
कर के मन में यशस्वी गान,
चढ़ा गांडीव पर तुरंत बाण,

शत्रु ताने हथियार खड़ा
अर्जुन अपना गांडीव उठा।

क्यों बैठा है निष्प्राण हुआ,
एक कदम नहीं क्या बढ़ सकता,
है किसकी प्रतीक्षा पार्थ तुझे,
बिन हरि नहीं क्या चल सकता।

तू मोह के परिंदे आज उड़ा,
अर्जुन अपना गांडीव उठा।

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दिव्य प्रकाश सिसौदिया
लेखक कविता लिखना अपना शौक ही नही धर्म मानते है। इतिहास विषय से स्नातक, परास्नातक, तथा यूजीसी नेट परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात इन्हें सिविल सेवा मुख्य परीक्षा देने का अवसर भी प्राप्त हुआ।इसके अतिरिक्त लगभग 8 वर्षो तक रामलीला में "लक्ष्मण" का अभिनय भी करते रहे है। बाकि इनका बेहतर परिचय कविताये ही दे सकती है। वर्तमान में लेखक उत्तर प्रदेश सरकार में " असिस्टेंट कमिशनर" के पद पर चयनित है।

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