जो बातें ‘कही’ नहीं जातीं
वो ‘कहीं’ नहीं जातीं
कितना भी
तिरस्कार करो
धिक्कार दो
खड़ी रहती हैं
लज्जाहीन बनके
मन की देहरी पर
और
खटखटाती रहती हैं
सदियों से बन्द मन
के किवाड़…
जो बातें कही नहीं जातीं
वो कहीं नहीं जातीं।

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