किताब अंश : इरशाद कामिल की किताब ‘काली औरत का ख़्वाब’ से | From ‘Kali Aurat Ka Khwab’, a book by Irshad Kamil

वही अख़बार का दफ़्तर होगा, वही दूसरी मंज़िल होगी, वही दूसरी मंज़िल का दाएँ हाथ का आख़िरी कमरा, जो दो हिस्सों में बँटा था। जिसके दूसरे हिस्से में एक अ-दिलचस्प-सा अधेड़ बैठा विज्ञापन देख रहा होगा। दो हिस्सों में बँटे कमरे के झरोखे में रखा लाल रंग का सरकारी क़िस्म का फ़ोन बजा होगा और मेरी अम्मी ने कहा होगा, “इरशाद से बात करवा दीजिए।”

और उस अ-दिलचस्प अधेड़ ने मेज़ पर अपनी उँगलियाँ बजाते हुए कहा होगा, “वो तो नौकरी छोड़ गया।”

तब शायद मेरी अम्मी को यक़ीन आ गया होगा कि मेरे बेटे का बॉम्बे जाने का इरादा पक्का है। जब उसने बाक़ियों को बताया होगा घर पर, हंगामा तो हुआ होगा।

* * *

सर्दी अभी पूरी तरह उतरी नहीं थी पहाड़ से। घर के आँगन में देर रात तक बैठा जा सकता था। मैं चारपाई पर बैठा था, अब ऐसा लग रहा है कि वो चारपाई नहीं कटहरा था और मैं बैठा नहीं, खड़ा था उस कटहरे में। मेरे इर्द-गिर्द बहुत-से लोग बैठे थे, शायद मेरे घर वाले थे या पड़ोसी-रिश्तेदार या मेरे कोई भी नहीं, मुझे ठीक से याद नहीं। मुझे सिर्फ़ मेरे ठीक सामने बैठी अपनी अम्मी याद है। इस बार जिसकी क़ब्र पर फ़ातिहा पढ़ने भी नहीं आए थे मेरे इर्द-गिर्द बैठे कई लोग। शायद समय नहीं निकाल पाए होंगे अपनी व्यस्तताओं से।

एक ने पूछा, “नौकरी क्यों छोड़ दी?”

दूसरा बोला, “बॉम्बे जाएगा।”

तीसरे ने चटखारा लेते हुए कहा, “गाने लिखेगा वहाँ जाकर, आनन्द बख़्शी बनेगा।”

चौथा अपनी समझदारी दिखाते हुए बताने लगा, “गाने लिखके पेट नहीं भरता।”

पाँचवाँ कहने लगा, “गाना लिखना कोई काम होता है क्या?”

छठे ने कहा, “काम करने का मन हो तब तो काम के बारे में सोचे।”

सातवाँ उचकते हुए बोला, “जहाँ काम था, वहाँ तो इसने नौकरी छोड़ दी।”

आठवें ने भी अपना मुँह खोलना ज़रूरी समझा, “वो भी हमें बिना बताए।”

नौवाँ कहता, “हम ही बोले जा रहे हैं, उसे भी तो कुछ बोलने दो।”

दसवाँ फिर वही सवाल दोहराने लगा, “नौकरी क्यों छोड़ दी?”

मेरी अम्मी ने उन सबसे ज़रा चिढ़ते हुए कहा, “छोड़ी है तो कुछ सोचकर ही छोड़ी होगी, बच्चा तो है नहीं वो।”

नुक़्स निकालने और मज़ाक़ उड़ाने में, वहाँ बैठे आठ-दस लोगों में से हरेक, कम से कम तीन-चार लोगों के बराबर था। वो आठ-दस के आठ-दस लोग मेरी अम्मी को ऐसे देखने लगे जैसे उसने बहुत बड़ी बेवक़ूफ़ी की बात कह दी हो। असल में मुझे ठीक से याद नहीं कि वो आठ-दस थे, ज़्यादा थे, एक ही था, या फिर कोई भी नहीं था, सिर्फ़ मेरा वहम था कि कोई है। शायद वहम ही था कि कोई है मेरे और मेरी अम्मी के अलावा उस घर में, मेरे और उसके साथ। फ़िलहाल बनना तो गीतकार ही था, ये वही ख़्वाब था जो बरसों पहले मेरे बड़े भाई सलीम ने देखा था। उसे भी शायद ऐसे ही आठ-दस लोगों ने रोका होगा, जो होंगे या शायद नहीं होंगे, शायद एक ही होगा, या दो। शायद उस वक़्त मेरी अम्मी इस तरह बोल नहीं पायी होगी। शायद बोलना नहीं सीखा होगा उसने तब तक। शायद भाषा नहीं आती होगी उसे उन आठ-दस लोगों की, जो आठ-दस थे, या एक-दो, थे भी या नहीं। क्या पता।

* * *

लगभग सत्रह साल पहले। पतला-सा, लम्बा-सा, मटमैला-सा, बौखलाया-सा, उम्मीद से भरा नौजवान उतरा है नयी दिल्ली बस अड्डे पर। थोड़ा जानकार है दिल्ली का, आ चुका है कई बार पहले भी दूरदर्शन के छोटे-मोटे काम करने। हरे रंग का भारी सूटकेस हैण्डल की गरदन से पकड़ा हुआ है। लोकल बस लेकर वहाँ जाएगा जहाँ उसका मलेरकोटला का पड़ोसी रहता है। वो पड़ोसी जिसके साथ दीवार पे खड़े होकर उसने बड़े पतंग उड़ाए हैं। वो पड़ोसी जिसकी आजकल अपनी घरवाली के साथ नहीं बनती। जिससे दुःखी होकर एक बार चण्डीगढ़ फ़ोन किया था उसने इस बौखलाए से लड़के को। इस लड़के ने उस पड़ोसी को दस हज़ार का काम दिलवाया था अपनी जान-पहचान से। उसी के एहसान तले उस समय पड़ोसी ने कहा था, दिल्ली आ जाना मैंने किराये का घर लिया हुआ है, वहाँ से दोनों चलेंगे बॉम्बे। मैं जानता हूँ बॉम्बे को, बड़ा मज़ेदार है, लेकिन सबको ख़ुश होकर नहीं मिलता, वहाँ भी है मेरा फ़्लैट, एक दोस्त के साथ किराये पर लिया हुआ। उसी पड़ोसी ने कहा था, एक-आध दिन मेरे साथ दिल्ली रुकना फिर दोनों बॉम्बे। लोकल बस में बैठकर उसी के घर जाएगा अब ये लड़का। आने से दो दिन पहले फ़ोन पे बात भी हुई थी पड़ोसी की और उस लड़के की। लोकल बस का नम्बर भी बताया था। कहाँ उतरना है ये भी बताया था, किस पीसीओ से फ़ोन करना है घर पर, ये भी जानकारी दी थी। पड़ोसी वहीं पहुँच जाएगा दो मिनट के अन्दर।

पड़ोसी पहुँच गया लड़का ख़ुश हो गया। पड़ोसी ने लड़के को जफ्फी मारी, उसका सूटकेस पकड़ा और चल दिया सड़क से अन्दर गलियों में।

ये बताते हुए कि दिक्कत हो गयी है।

लड़के ने पूछा, “क्या?”
पड़ोसी बोला, “कुछ मेहमान आ गए हैं, यानी मेरी बीवी का भाई और उसका परिवार, अब मैं तुम्हें अपने घर में नहीं रख सकता।”

लड़का वहीं रुक गया।

पड़ोसी बोला, “घर तो चलो। चाय पीकर वापस चले जाना।”

लड़का सोच में पड़ गया कि अब… अब कहाँ जाएगा वो?

चाय, बिस्कुट, मेहमान, भाभी—अलविदा। सीढ़ियाँ उतरता हुआ लड़का और पीछे-पीछे पड़ोसी।

पक्की सड़क तक आया फिर गले मिला। पूछा, “अब कहाँ जाएगा?”

लड़के ने कहा, “उसी नम्बर की बस से वापस बस अड्डे।”

पड़ोसी थोड़ा घबराया और पूछा, “मतलब?”

लड़का बोला, “बस अड्डे के सामने तिब्बतियों का टूरिस्ट लॉज है, डेढ़ सौ में कमरा मिल जाता है, वहीं रहूँगा। मेरे पास नौ हज़ार हैं। पहले भी रहा हूँ एक-आध बार वहाँ। जब बॉम्बे चलना होगा बता देना।”

एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार-पाँच-छह दिन, पड़ोसी ने कोई अता-पता नहीं दिया।

इसी तिब्बती टूरिस्ट लॉज में खायी थी लड़के ने वो कच्चे चावल की खीर जो उसकी पसन्द की लड़की स्टील के डिब्बे में डालकर और प्रिण्टेड रूमाल में लपेटकर चण्डीगढ़ के बस अड्डे पर पकड़ा गयी थी उसको। और साथ में ग्यारह पन्नों का एक ख़त भी था, जिसके साढ़े नौ पन्नों पर कुछ नहीं लिखा था। इसके अलावा कि यहाँ जो मन आए, लिख लेना।

इन छह दिनों में लड़के के दो हज़ार और ख़र्च हो गए। लड़के ने पड़ोसी को मन ही मन कोसा जिसने लगभग धोखा-सा दे दिया था लड़के को, फिर अपने एक और पुराने दोस्त को फ़ोन घुमाया और दिल्ली से तत्काल का टिकट करवाकर बॉम्बे आ गया।

बॉम्बे आकर उसे पता चला कि फ़िल्मों की कहानी में गाने होते हैं, ये सब जानते हैं। हर गाने के पीछे एक कहानी होती है, ये सब नहीं जानते। बस, सड़कों की धूल फाँकता-फाँकता लड़का गाने लिखने लगा और कहानियाँ बनने लगीं।

'कैसा है मेरा जीवन' - तस्लीमा नसरीन

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