चुम्बन

‘Chumban’, a poem by Rahul Meena

आदिवासियों का प्रकृति को चूमना
माता का पुत्र को चूमना
धरती का सूर्य को चूमना
रेत का पानी को चूमना
है किसी के चूमे हुए को चूमना।

किसी के माथे को चूमना
है ज़ुल्मतों का रोशनी को चूमना
किसी के हाथों को चूमना
है समुद्र का किनारे को चूमना
किसी के होठों को चूमना,
जो चूमने की चरम अभिव्यक्ति है,
है आत्मा का परमात्मा को चूमना।

होंठो को चूमना
तभी सार्थक माना जाता है
जब क्रिया की प्रतिक्रिया होती है
ये नियम फ़िजिक्स का नहीं
बेबाक मोहब्बत की एक प्रमेय है
जिसकी परिणति है चुम्बन।

प्रेमियों को उदघोषणा
कर देनी चाहिए होंठो के चूमने को
चुम्बन की सर्वश्रेष्ठ अवस्था
और करने चाहिए
सार्वजनिक आयोजन
जिससे विस्तार हो सके प्रेम का,
ताकि चूमने को कोई न समझे
एक संगीन अपराध
जो अब तक होता था अँधेरे के साये में
वो अब चूमेंगे उन्मुक्त होकर
और समा जाएँगे एक-दूसरे में
दरिया को पार करके।
सिमट जाएँगे नफ़रत के हर बोल
और लहराएगी ख़ुशबू
प्रेम की, ख़ूबसूरती की।

अब क्रांतियाँ प्यार से ही आएँगी
नफ़रतों की आँधिया ख़ुद-व-ख़ुद मिट जाएँगी।