दोज़ख़ी

मैं दबे पाँव दाखिल हुआ। बाहर का गेट भी मैंने धीरे से खोला – ऐसे कि आवाज न हो। घर के सामने वाला दरवाजा उढ़का हुआ था – हमेशा की तरह। मैंने उसे भी धीरे से धकेला था। असल में मैं जमील के सामने बिल्कुल अचानक आना चाहता था – दिल के दौरे की तरह।

यह भोपाल जैसे शहर की दोपहरी थी – ढलती हुई। दिन में इतना सूनापन और आलस्य था कि अक्सर लोग सो रहे थे। मैं जानता था कि यह जमील के घर पर मिलने का वक्त था। शहर और उसके अपने मिजाज के लिहाज से नहीं, उसके काम के एतबार से भी। उसका कालेज सुबह-शाम लगता था और सारी दोपहर खाली रहती थी।

जमील दीवान पर लेटा हुआ था, दीवार की ओर मुँह किए। आहट से चौंक कर जब उसने देखा तो एकाध पल बस देखता ही रह गया। हैरान! फिर ‘अरे’ कहता हुआ हड़बड़ाकर उठा और हम दोनों लिपट गए। उसकी जकड़ बहुत जबरदस्त थी। बाँहें उसकी लंबी और मजबूत थीं और हथेलियाँ जैसे मेरी पीठ में धँस जाना चाहती थीं, गोश्त-पोश्त को छेदती हुई। पहली बार लगा कि हाथ की अँगुलियाँ भी बोलती हैं।

“कब आया?” कई पल बाद उसने गर्दन हटाकर पूछा, लगभग रुँधे हुए स्वर में। उसका चेहरा अब भी मेरे इतने पास था कि दोनों एक-दूसरे को देख नहीं पा रहे थे।

“सुबह,” मैंने कहा, “दक्षिण एक्सप्रेस से।”

अलग हुए। बैठे।

“मैं आज सुबह ही याद कर रहा था,” वह बोला और गावतकिए से टिककर मेरी ओर देखने लगा। ऐसी भरपूर नजर थी, जिसमें आप समो लेना चाहते हैं – सब कुछ। तभी बगल वाले कमरे का परदा हटाकर बीवी कनीज आईं, हँसती हुई। सलाम किया। पास बैठी। बोली। पूछा। खुश हुई।

“बाजी कैसी हैं?” मैंने कनीज से कहा, “उनसे मेरा सलाम…”

“नमाज पढ़ रही हैं,” वह अंदर देखती हुई बोलीं, “और तुम्हारे लिए क्या लाऊँ? पहले खाना खा लो…”

“इस वक्त?” मैं हँसने लगा, हमेशा की तरह। मैं जानता था कि आखिर वह खाना लाएगी और मैं खाऊँगा। वह उठकर अंदर चली गई।

“अब बाजी की तबियत कैसी रहती है?” मैंने जमील से पूछा।

बाजी का तख्त बाहर से ही दिखता है। और घर में दाखिल होते हुए मैंने देख लिया था कि वह नमाज पढ़ रही हैं। सवाल जैसे असुविधाजनक था। जमील सिगरेट का पैकेट टटोलने लगा। मिला तो एक जलाई और मेरी ओर देखकर सिर हिला दिया, यानी बस ठीक है। और फीकेपन से मुस्कुराया। बाजी-भाईजान यानी माँ-बाप। बाजी कई महीनों से बीमार चल रही थीं। घर पर हुए नए हादसे से भी पहले। शायद तभी से जब एक दिन भाईजान अचानक नहीं रहे थे। रात वे ठीक-ठाक सोए थे, लेकिन सुबह नहीं उठे, बस!

“कौन है अल्लन?” भीतर से आवाज आई। वह शायद मुसल्ले से उठ रही थीं। अल्लन यानी जमील। जमील ने मेरा नाम बताया। कहा कि मैं दिल्ली से आया हूँ, सलाम कर रहा हूँ। उन्होंने वहीं से दुआएँ दीं, बहुत थकी हुई आवाज में। फिर कुछ बड़बड़ाती-सी रहीं। क्या, यह मेरी समझ में नहीं आया। सोचा कि दरवाजे तक जाकर उन्हें देख लूँ, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ी। उनका सामना करना मेरे बस की बात नहीं थी।

“और?” थोड़ी देर बाद जमील ने मुझे वापस लाते हुए कहा, कहीं और ले जाने के लिए।

“तेरी दिल्ली कैसी है?”

“मेरी!”

जमील मुस्कुराया।

“दिल्ली एक दोज़ख़ है,” मैं पहले अक्सर कहा करता था। चार साल पहले जब मैं इस शहर से निकाला गया था तो मेरे मन में बहुत तल्खी थी। यह देश निकाला पिछली सरकार की इनायत थी और मेरे लिए यह भूलना मुश्किल था कि न मैं दिल्ली का हो सकता हूँ और न दिल्ली मेरी, जमील यह जानता था।

“चल, मेरठ की मारकाट ही सही। क्या हाल है?”

“वहाँ दंगे का इतिहास बहुत पुराना है, सन सैंतालीस से भी पुराना। नया मैं क्या बताऊँ! वही कह सकता हूँ जो अखबारों में है। हाँ सुना है कि मुरादाबाद और अलीगढ़ में बहुत तनाव है।”

“तुझे अखबारों पर भरोसा होता है?”

मैं चुप हो गया।

“जो लोग दहाने पर बैठे हैं, वे जानते हैं।” उसने कहा।

“कहाँ है दहाना?”

“दिल्ली दहाना नहीं है – मुल्क का, मेरठ का, जमशेदपुर या भागलपुर का…?”

मैं कमरे की दीवारों को देखने लगा, जिनमें कई आकारों की पेंटिंग्स लटकी हुईं थीं। कनीज की बनाई हुई। उनमें हुसैन और हेबार का मिला-जुला प्रभाव साफ था। जाहिर है कि मैं बचना चाहता था। शायद हम दोनों बचना चाहते थे, उससे जिसके छिड़ जाने का डर दोनों को ही था।

“तेरी पुरानी शक्ल लौट आई है,” जमील ने बात पलटते हुए कहा, “पिछली बीमारी में जाने वह कहाँ चली गई थी!”

“यह हार्ट-अटैक की देन है,” मैंने कहा और दंभभरी हँसी हसने लगा, ऐसे जैसे मैं कोई किला जीत आया हूँ।

“अब तो तू बिल्कुल ठीक है न?” उसने पूछा।

“बिल्कुल का तो पता नहीं। हाँ ठीक जरूर हूँ। उतना ही ठीक जितना दिल के मरीज रहते हैं।”

और यह कहते ही लगा कि मेरे स्वर में आत्मदया आ गई है। मैंने पुराने दंभ में लौटते हुए कहा, “असल में अब मैंने परवाह करना छोड़ दिया है। जब आना है, आ जाएगी। तब न डाक्टरों के चलते रुकेगी और न मेरे रोके।”

“बहुत दिनों तक यहाँ किसी को पता नहीं था,” जमील ने कहा, “अफवाह की तरह खबर आई कि कुछ उलटी सीधी..। हम लोगों ने घबरा कर दिल्ली फोन किया था, लेकिन तुम्हारे वहाँ के दोस्तों ने कहा कि वैसी कोई बात नहीं है। अस्पताल में जरूर है, ‘इंटेन्सिव केयर यूनिट’ में भी है, लेकिन हार्ट-वार्ट का कोई मामला नहीं है। वो तो दिल्ली से तुझे देख कर लौटे पंकज ने बताया कि सब-कुछ कितना सीरियस था… यह हुआ कैसे?”

“उसी तरह जैसे यह होता है अचानक!”

“घर पर…?”

“नहीं, दफ्तर में।”

“कैसे?”

“मैं बातें कर रहा था एक मिलने वाले से। एकाएक मुझे बेचैनी-सी हुई। सीने में जकड़न और दर्द के बगूले उठ आए थे और मैं पसीने से सराबोर हो गया। मेरी आवाज बिल्कुल मद्धिम हो गई थी, दिल डूबने लगा था। मैं उठना चाहता था, लेकिन मुझमें दम नहीं था। मैं बैठे रहना चाहता था लेकिन इतनी बेचैनी और घबराहट कि… थोड़ी ही देर में फर्श पर लेटा छटपटा रहा था…”

कहते-कहते मैं रुक गया क्योंकि जमील के चेहरे पर एक आतंक मैं साफ-साफ देख रहा था जो मैं चाहता था। मुझे खुशी थी कि मेरी जिस यातना को यहाँ मामूली ढंग से लिया था, मैं उसका हिसाब बराबर कर रहा था। दिल्ली के अपने दोस्तों के रवैये पर गुस्सा आ रहा था, सो अलग। यह ठीक है कि मसलहत के तहत मेरी बीमारी की संजीदगी को छिपाया गया था, लेकिन उस मसलहत ने मुझे उस सब से यहाँ महरूम कर रखा था, जो मैं चाहता था। लगभग एक साल के बाद मैंने इस शहर में प्रवेश किया था, एक ऐसे आदमी की तरह जो दुर्लभ होते-होते एकाएक रह गया था।

“तुम्हें याद है मैंने ताज़ियत का खत तुम्हें कब लिखा था? वह सात अप्रैल का दिन था, और कोई घंटे भर पहले मैंने तुम्हें लिखा था? तब मैंने सोचा भी नहीं था कि थोड़ी ही देर बाद मैं भी उस रास्ते पर पहुँच ही जाऊँगा जहाँ से हसीन कभी नहीं आया।”

तब भीतर से कनीज निकल आई और मेरे सामने कबाब-रोटियों की रकाबी रखती हुई बोली, “लो खाओ।” फिर एक स्टूल खींचकर सामने ही बैठ गई। पहला ही लुकमा तोड़ते हुए मुझे लगा कि हसीन का नाम मुझे नहीं लेना चाहिए था। शायद मैं चाहता भी नहीं था, लेकिन बात की रौ थी। लेकिन क्यों नहीं? क्या मैं पुरसे के लिए नहीं आया था? पुरसा और वह भी हसीन का। यह वह आदमी था जो अभी कल तक इसी शहर में दूसरों के पुरसे के लिए आया करता था और नहीं जानता था कि उसे क्या कहना चाहिए। वह चुपचाप बैठ जाया करता था – सूनी आँखों से एक तरफ देखता हुआ।

खबर मुझे यह भी दफ्तर से मिली थी, दिल्ली में जमील ने नहीं दी थी। एस शहर में भी नहीं गई थी, बुरहानपुर से सईद महमूद ने लिखा था।

“तुम्हें यह जानकर बहुत सदमा होगा,” उसने खत में कहा था, “हम दोनों के अजीम दोस्त हसीन अहमद सिद्दीकी का नाइजीरिया में इंतकाल हो गया। उसका हार्ट-फेल हो गया था। नसरीन भाभी अभी मैयत लेकर भोपाल आई थीं, और उसे दफनाकर मैं कल लौटा हूँ। हम लोगों का जो होना था, हुआ, लेकिन सोचो कि तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ रह गई एक जवान औरत के साथ जो नाइंसाफी हुई है, क्या उसकी कोई तलाफ़ी हो सकती है?”

बड़ी देर तक मैं खत लिए बैठा रहा था। मैंने उसे कोई तीन बार पढ़ा था और हसीन के नाम पर तीन बार नजर डाली थी। मैं यकीन करना चाहता था लेकिन हो नहीं रहा था और जब हुआ तो उस पल में राहत और छुटकारे की साँस थी। फिर मैंने दुख को समेटकर धीरे-धीरे इकट्ठा किया था और एकदम दुखी हो गया था।

“यह भी कोई बात हुई?” मैं उसके बाद हर आने वाले को बताकर कह रहा था, “क्या यह कोई उसके जाने वाले की उम्र थी और वह भी दिल के दौरे से। वह तो मुझसे भी दो साल छोटा था। वह खुदा से खौफ खाने वाला परहेजगार आदमी था और सिगरेट तक नहीं पीता था।

यह सब कहते हुए या तो मैं बहुत डरा हुआ था या शायद अपने डर को दूर कर रहा था, हालाँकि दफ्तर से घर लौटते तक भी उससे पीछा नहीं छूटा था। वह कहीं इतने अंदर पहुँचकर बैठ गया था कि उसने मुझे एकाएक चुप कर दिया। खबर यह घर के लिए भी बड़ी थी लेकिन मैंने उस दिन बीवी से भी नहीं कहा – इस डर से कि घर पर भी देर तक वही जिक्र होता रहेगा और रात को हसीन का चेहरा मुझे सोने नहीं देगा।

उस रात मैं सो तो गया लेकिन हसीन ने मुझे तंग बराबर किया। उसका चेहरा चारों ओर से आकर मुझ पर आक्रमण करता था और सपने में सारी रात उसकी मैयत दिखाई दी – कई दिन पुरानी मैयत! यह उस दिन ही नहीं उससे अगले दिन भी हुआ करता था और उसके अगले दिन, हालाँकि मैं किसी से कुछ भी नहीं कह रहा था। ताज़ियत का खत भी तीन दिनों तक टालने के बाद मैंने जमील को लिखा था और मैं भी हसीन की तरह नहीं जानता था कि पुरसे में क्या कहना चाहिए…

बात अजीब सही, लेकिन सच तो यह है कि हसीन मेरा दोस्त नहीं रह गया था, खासकर इधर के बरसों में – जब वह नाइजीरिया चला गया था या शायद उससे भी पहले जब मैं धीरे-धीरे उसके छोटे भाई जमील का दोस्त हो गया था।

पंद्रह बरस पहले जब मैं भोपाल आया था तो दोस्ती उसी से हुई थी। दोनों भोपाल में बाहर से आए हुए थे और वहाँ हमारा कोई घर नहीं था। हसीन में एक खास तरह का मर्दाना आकर्षण था – सीधे अपनी ओर खींच लेने वाला था। वह लंबा और छरहरा था और हल्के-हल्के गंजा हो रहा था। पहले ही दिन मैंने देख लिया था कि वह एक महीन अहसासों वाला गुस्सैल और आक्रामक आदमी है जो अपने आप पर हँस सकता था।

वह इतने छोटे-छोटे और खूबसूरत मुबालग़े करता था कि कोई भी हँसता-हँसता उसका हो जाता था। तब हम लोग पुराने भोपाल की अमीरगंज गली में रहते थे और जवान थे। हसीन एक प्राइवेट कालेज में विज्ञान पढ़ाता था और मैं दफ्तर में कलम घसीट रहा था। मुहल्ला पुराने रईसों और अमीरों का था और हम जैसे फटे-हाल इक्का-दुक्का ही पड़े हुए थे अपने-अपने मुँह छुपाए।

असल में हम दोनों की दोस्ती तो तंगदस्त, कुंठित और गुस्सैल आदमियों का ऐसा मेल था जो दोनों को राहत देती थी। रीझा पहले मैं ही था बाद में उसे रिझा लिया था, हालाँकि हम दोनों अलग-अलग किमास के लोग थे। वह विज्ञान पढ़ाता था लेकिन दकियानूस और मजहबी था और हँसी-हँसी में अपने को जन्नती कहता था। मेरा विज्ञान से कोई लेना-देना नहीं था, लेकिन मैं उसी के सहारे अपने को आधुनिक लगता था और प्रगतिशील बना हुआ था – हसीन का फतवा सिर-माथे रखे हुए कि मैं दोज़ख़ी हूँ। सच्चाई यह है कि हम-दोनों एक-दूसरे को दोज़ख़ी समझते थे और दोनों मिलकर उस तीसरे को जो हमारे बीच में नहीं होता था, लेकिन जिसे हम कांदू कहते थे।

“तुम मक्कार हो,” एक बार उसने गुस्से में खोलते हुए मुझसे कहा था, “अव्वल दर्जे के पाखंडी और धूर्त…”

“क्यों, क्या तुमसे भी बड़ा?”

“हाँ, मैं तो तुम्हारे पाँव की धूल भी नहीं हूँ।”

“वह तो तुम वैसे भी नहीं हो।” मैंने हँसकर उड़ाना चाहा था।

“तुम दोनों जहाज के मजे करना चाहते हो,” उसने करीब-करीब बाल नोचते हुए कहा था, “नास्तिक-वास्तिक कुछ हो नहीं, वह तुम्हारा ढोंग है।”

“तुम्हारे जन्नती होने से भी बड़ा ढोंग?” मैंने प्रतिवाद किया था, “क्यों नाहक फाके करते हो यार!”

मैं अक्सर कहा करता था कि जो रोजेदार होते हैं, वे सेहरी के बाद इफ्तार और इफ्तार के बाद सेहरी की फिक्र नहीं किया करते। जो लोग रमजान के दिनों में सुबह-शाम थैली लिए बाजार में भागते नजर आते थे, कभी मुर्ग तो कभी तीतर के लिए, कभी लवे तो कभी वेटर कबी मछली तो कभी बिरयानी के लिए, मैं उनका मजाक उड़ाता था – यह जानते हुए भी कि इससे हसीन को चोट लगती है क्योंकि मैं यही चाहता था।

“तुम हीयों में हो और न सीयो में। न यहाँ, न वहाँ। अल्लाह तुम पर रहम करे।” वह मुझसे कहता था।

यह सिर्फ एक दिन की बात नहीं थी। अक्सर हम दोनों किसी-न-किसी बात पर लड़ते थे। गुस्से में एक-दूसरे से कभी न बोलने की धमकी देते थे, लेकिन अगले दिन या उसे अगले दिन फिर मिलते थे। फिर से लड़ने के लिए…

यह वह दौर था, जब मुल्क में फसाद की फसल आई थी और एक के बाद एक कई शहरों में दंगे हो रहे थे, क्योंकि शहर में तनाव था। सरकार सतर्क हो गई थी। जगह-बेजगह पुलिस और होमगार्ड के जवान तैनात थे। रोज अफवाहें उड़ती थीं और बाहर से रोज खबरें आती थीं – हैबतनाक खबरें! बरसों से साथ-साथ रहे आए हिंदू-मुसलमान एक-दूसरे को संदेह और डर से देखने लगे थे, और छोटे-छोटे समूहों में बँट गए थे।

“देख लो,” एक ऐसी ही शाम हसीन ने घबराए हुए स्वर में कहा था, “हैवान के बच्चों ने मुल्क का बँटवारा करके क्या कर दिया है…”

उसने सुबह के अखबार में कुछ और दिल दहला देने वाली खबरें पढ़ ली थीं। उसका शेव बढ़ा हुआ था और बाल रूखे थे – उड़े-उड़े से। वह और दिनों से ज्यादा गंजा लग रहा था।

“अब यह मुल्क रहने लायक नहीं रहा!” वह बोला, “किसी दिन हम लोग भी काट कर फेंक दिए जाएँगे और कोई रोने वाला नहीं होगा।”

“क्यों मैं जो हूँ।” मैंने हँसकर कहा। दरअसल मैं अपने और उसके दुख को हँसकर उड़ाना चाहता था – अँधेरे में गाए जाने वाले गीत की तरह।

“तुम भी नहीं होगे,” उसने आँख तरेरकर तल्खी से जवाब दिया, “कल जब काफिरों का जत्था गँडासे और खंजर लेकर तुम्हारे दरवाजे पर आएगा, तब कोई नहीं पूछेगा कि तुम क्या सोचते हो या तुम्हारे खयालात क्या हैं! पहचान के लिए तुम्हारा नाम काफी है।”

“तुम तो कह रहे थे कि पहचान के लिए सिर्फ नाम काफी नहीं होता!”

“वह और बात थी। दूसरे सिलसिले में कही गई थी। मसलों को गड्डमड्ड मत करो। मैं जानता हूँ तुम चालाकी कर रहे हो।”

हाँ, मैं चालाकी कर रहा था। जान-बूझकर अनजान बने रहने की चालाकी। सच्चाई से डरकर भाग खड़े होने की चालाकी। हसीन से असहमत होने और उसे आहत करने की चालाकी। मैं हसीन से बिल्कुल सहमत नहीं होना चाहता था, क्योंकि उसकी बात मानना अपने पाँव के नीचे के उस टीले को काटना था जिस पर मैं खड़ा था।

इसी बीच एक ऐसी बात हुई जिसके बारे में मैंने सोचा भी नहीं था। हसीन एकाएक मेरे लिए दुर्लभ हो गया था। सुबह उसका कालेज हुआ करता था, दोपहर से मेरा दफ्तर। एक शाम का ही वक्त था, जिसमें हम अक्सर मिला करते थे, लेकिन इधर वह कई शामों से गायब था। मेरे लिए हसीन का घर अपरिचित नहीं था, जमील भी मेरे लिए नया नहीं था। मैं जानता था कि वह हसीन का छोटा भाई है और उसी कालेज में पढ़ता है।

जब-जब मैं हसीन के साथ गप-शप या चाय पर होता, अक्सर जमील भी हुआ करता था – यहाँ तक के उनके बाप-भाईजान भी। वह इस अर्थ में अजीब घर था कि वहाँ पहुँचे किसी भी दोस्त या मेहमान से पूरा घर मिलता था और सभी लोग बातचीत में शरीक होते थे। मुझे भाईजान का अपने बीच होना कई बार खलता था, क्योंकि उससे हमारी आजादी छिनती थी, लेकिन जमील का होना मुझे अच्छा लगता था। दरअसल मैं जमील को शुरू से पसंद करता था।

अब सोचता हूँ तो लगता है कि जमील का पहले मुझसे न टकराना या हसीन के माध्यम से न मिलना महज एक संयोग था, वरना शायद मैं सीधे उसी का दोस्त होता। यह बात तब भी लगी थी जब मैं हसीन का अता-पता करने कई बार उसके घर गया था और जमील मुझे अकेले मिला था। फिर मैं धीरे-धीरे हसीन से कट गया था।

“हसीन भाई से आजकल शाम को मिलना मुश्किल है,” मेरी दो-तीन बार की मायूसी के बाद जमील ने मुझको बताया था, “दरअसल वे और सईद महमूद उसी के चक्कर में हैं।”

“किस चक्कर में?”

“ताज्जुब है कि आपको पता नहीं! क्या आप नहीं जानते की दोनों बाहर निकलने की जुगाड़ में हैं?”

“बाहर यानी?”

“बाहर यानी कहीं भी। मिडिल ईस्ट, लीबिया, अफ्रीका कहीं भी जहाँ जॉब मिले, अच्छे पैसे मिलें! सईद महमूद की तो मजबूरी है। इस कालेज की मास्टरी में वह वैसे ही कंगाल है। चार-चार बेटियाँ सीने पर बैठी हुई हैँ और बेटा पोलियो का शिकार है… हसीन भाई का यह है कि वे बेहतर जिंदगी चाहते हैं…”

सईद महमूद तब भोपाल में था और उसी कालेज में अंग्रेजी पढ़ाता था। वह हम तीनों का दोस्त था लेकिन किसी के हाथ नहीं आता था। क्योंकि वह हर वक्त जल्दी में होता था – एक ऐसी बेचैनी भरी जल्दी जो उसे कहीं भी दो पल टिकने नहीं देती थी। वह आता तो बैठता नहीं था। बैठता तो पर तोलने लगता था और सच तो यह है कि उसके आते ही धड़का लगा रहता था कि वह किसी भी पल चला जाएगा। हसीन और उसकी दोस्ती एक हद तक पेशे की वजह से थी, लेकिन मिजाज के लिहाज से वह मेरे ज्यादा नजदीक पड़ता था। फिर भी मुझे ताज्जुब नहीं हुआ, क्योंकि दोनों एक ही मकसद के लिए इकट्ठे हुए थे, भले ही कारण अलग-अलग हों।

“क्यों भाग लिए?” कई दिनों बाद जब हसीन पकड़ में आया तो मैंने उसे धर दबोचा। हसीन ने मुझे उसी अंदाज से देखा जिसमें उसकी छोटी-छोटी आँखें गोल होकर नुकीली हो जाती थीं और आक्रामक लगती थीं।

“कौन भाग रहा है?”

“तुम और कौन?”

“मैं भाग नहीं रहा, जा रहा हूँ!”

“एक ही बात है!”

“एक ही बात नहीं है,” उसने जोर देकर कहा, “भागने वाले पाकिस्तान में हैं और वो कभी लौटकर नहीं आएँगे।”

“तुम लौटकर आने वाले हो?”

“क्यों मैं क्या काले और हब्सियों के बीच मरने जा रहा हूँ?”

“क्या पता!”

“तुम जैसे दोस्त तो यही दुआ करेंगे। करो…”

“मैदान तो छोड़ ही रहे हो।”

“दो-चार साल के लिए घर से बाहर निकलना मैदान छोड़ना है, भागना है?” उसने बौखलाकर कहा, “मैं अपने और अपने बच्चों के मुस्तकबिल के बारे में कुछ ना सोचूँ? यहीं पड़ा सड़ता रहूँ? अपने आस-पास लुच्चों, लफंगों, बदमाशों और बदकारों को पनपता हुआ देखता रहूँ? रोज कुढ़ूँ… रोज लहू जलाऊँ?”

“मुस्तकबिल और बच्चे तो मेरे भी हैं।” मैंने कहा।

“तुम अगर कीचड़ में पड़े रहना चाहते हो तो कोई क्या कर सकता है!” वह बोला, “न तो तुम ऊपर उठ सकते हो, न उठना चाहते हो।”

“पैसों के पीछे भागना ऊपर उठना है?”

“यह बीमारों, निकम्मों और बुजदिलों की फिलासफी है,” उसने चिल्लाकर कहा, “इसे तुम अपने पास ही रहने दो।”

और वह तेजी से चला गया।

नाइजीरिया जाने से पहले हसीन से यह मेरी आखिरी बातचीत थी। कम-से-कम इस सिलसिले में। इसके बाद हम मिले ज़रूर, लेकिन इसके बाद हर मुलाकात सरसरी थी और हमारी बातों का कोई मतलब नहीं था। वैसे भी तब तक एक-दूसरे से हम लोग कट चुके थे। फिर एक दिन सुना कि वह चला गया – मुझसे बिना मिले और मुझे कहीं गहरे चोट करता हुआ। गया सईद महसूद भी, लेकिन उसका जाना एक उम्मीद पर लगाई हुई छलाँग थी। वह बीवी के बचे-खुचे जेवर और मौरूसी जमीन बेचकर सऊदी अरब गया था, जबकि हसीन को नाइजीरिया के किसी स्कूल में बाकायदा काम मिला था, और उसके लिए हवाई जहाज का टिकट आया था…

“और कुछ लाऊँ?” कनीज मुझसे कह रही थीं। मेरे सामने खड़ी और रकाबी की ओर बढ़ती हुई। मैं जैसे चौंका।

“और क्या?”

“कबाब या एकाध रोटी?”

“बस, बस,” मैंने कहा, “अव्वल ही बहुत हो चुका। कायदे से मुझे खाना भी नहीं चाहिए था। दोपहर का खाना अक्सर मैं टालने की कोशिश करता हूँ – खासकर बाहर। डाक्टर कहते हैं कि इसे नियम बना लो…”

“और तुमने बना लिया?” जमील ने मुस्कराकर टोका और मैं हँसने लगा। जमील जानता था कि दिल्ली के इन तीन-चार बरसों में मैंने कितनी एड़ियाँ रगड़ी हैं। अभी दिल्ली में पाँव भी नहीं जमे थे कि मालूम हुआ, मैं एक घातक बीमारी की चपेट में हूँ। क्या करता? नफरत या उनके खिलाफ अपने बड़बोलेपन ने मेरी कोई मदद नहीं की और मैं अस्पताल पहुँच कर एक फाइल बन गया – केस नं. सी-535!

वे दोज़ख़ के दिन थे।

रकाबी उठाकर कनीज गई नहीं खड़ी रही, फिर दो पल मुझे घूरकर पूछा, “अभी पिछले दिनों तुम्हारा क्या हार्ट-वार्ट का कुछ…”

मैंने चौंककर देखा। हाँ, चोट लगी थी। क्या कनीज को खबर भी नहीं थी? मैं तो समझ रहा था इस घर में मेरे लिए कभी नीम मातम का माहौल बना होगा और जब पहुँचूँगा तो मुझे ऐसे लिया जाएगा, जैसे खोया हुआ आदमी अचानक बरामद हो गया हो।

“इसकी बुरी हालत हो गई थी,” जमील कनीज से कहने लगा, “मैस्सिव हार्ट-अटैक था। कोई पचास घंटे ज़िन्दगी और मौत के बीच झूलता रहा। वह तो दिल्ली जैसी जगह थी, पेसमेकर लगाकर बचा लिया, वरना खुदा जाने क्या होता!”

कनीज का चेहरा एक पल के लिए सफेद हो गया – भय से। उसके बहनोई इसी से गए थे, बहन इसी से, ससुर इसी से और अब जेठ भी – जेठ यानी हसीन भाई। जाने से पहले वह सँभलती हुई बोली – “और सिगरेट पीना-भर मत छोड़ना, अच्छा!”

थोड़ी देर बाद मेरी तिपाई के सामने चाय की ट्रे आ गई। स्टूल खींचकर कनीज मेरे सामने बैठ गई और चाय बनाने लगी। अंदर के कमरों में बाजी थीं, लेकिन उनके वहाँ होने का आभास यहाँ से मुश्किल था। पहले तो खैर, वह नमाज पढ़ रही थीं, लेकिन इतनी देर में न तो वह बाहर आई थीं और न मुझमें ही इतना साहस था कि उठकर मैं ही उनसे मिल लूँ। मैं फिर दीवारों को देखने लगा, जिन पर कनीज की पेंटिंग्स लटकी हुई थीं – बरसों से उन्हीं जगहों पर और वैसी ही। लेकिन जैसे पहली बार ध्यान आया हो कि वे तुगरों के आसपास हैं। एक तुगरा था अल्लाह। दूसरा था मुहम्मद। उस दरवाजे के ऊपर जो घर के भीतर खुलता था, कुरान की एक आयत थी – ‘इनल्लाहे मुअस्साबेरीन’ यानी सब्र करने वाले के साथ खुदा है।

क्या मैंने सब्र किया था? चाय का आखिरी घूँट लेते हुए मैंने सोचा – क्या मैंने उन मित्रों को माफ नहीं किया था, जो अस्पताल में मुझे देखने या मुझसे मिलने नहीं आए थे, और क्यों उन दुश्मनों के लिए भी मैं नरम हो गया था जो मेरे पलंग के पास आकर खड़े हो गए थे।

“या अल्लाह!” तभी अंदर से बाजी की गुहारती हुई आवाज आई – “रजा बे रब्बी…”

कनीज ने बर्तनों को ज़रूरत से ज़्यादा आवाज़ करते हुए समेटा और ट्रे में रखने लगी – एक के बाद एक। फिर उठकर अंदर चली गई।

“बाजी को कैसे सँभाला था?” कुछ पलों की चुप्पी के बाद मैंने पूछा था।

“सब अपने-आप सँभल जाते हैं”, वह बोला, “जिस वक्त हसीन भाई की खबर नाइजीरिया से मिली थी, बाजी सख्त बीमार थीं। लगता था बचेंगी नहीं। मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ? डाक्टर से पूछा तो कहने लगा कि पता नहीं ऐसी हालत में यह सदमा बर्दाश्त कर भी पाती हैं या नहीं लेकिन उन्हें न बताना भी तो ज्यादती होगी। आखिर कब तक छिपाओगे? मैं दो दिनों तक सबसे लड़ता रहा कि उन्हें न बताया जाए। तुम तो जानते हो वह हसीन भाई को हम सबसे ज्यादा चाहती थीं। मेरा कहना था कि क्या यह मुमकिन नहीं कि उन्हें कभी पता ही न चले। झूठू चिट्ठियाँ मँगवाई जा सकती हैं या ऐसा ही कुछ… ज़्यादा से ज़्यादा उन्हें इतनी चोट तो लगती न कि लड़के ने आँखें फेर लीं और नालायक निकल गया… लेकिन आखिर मुझे ही हारना पड़ा। फिर उन्हें बताया गया और अब सब-कुछ तुम्हारे सामने है…”

मैंने पूछ तो लिया लेकिन पूछने के साथ ही मुझे अपने सवाल के बेतुकेपन का ध्यान आया। यह वही सवाल था जो हर मिलने वाला मुझसे भी पूछा करता था और मुझे झुँझलाहट होती थी। मैं कहने लगा, “मेरा मतलब है कि इससे पहले कुछ…”

“नहीं, कभी कुछ नहीं। दो-एक दिन पहले अपनी तबियत के ठीक न होने की शिकायत ज़रूर कर रहे थे। उस दिन वे रोज की तरह काम पर गए थे। भाभी से कह रखा था कि शाम को डाक्टर के पास चले चलेंगे। शाम को वे तैयार भी हो गए थे, लेकिन उसी वक्त उनका एक पाकिस्तानी दोस्त आ गया – एक वीडियो कैसेट लिए और वे टी.वी. देखने लगे। शायद तुम नहीं जानते कि इधर उन्होंने हिन्दी के कैसेट्स और हिंदुस्तानी संगीत के एल-पीज का कितना बड़ा जखीरा कर रखा था।”

“हाँ मैं नहीं जानता था। सात साल पहले जब हसीन यहाँ था तो वह हिन्दी फिल्मों से नफरत करता था और उसे हिंदुस्तानी संगीत में कोई दिलचस्पी नहीं थी।”

“अपने पाकिस्तानी दोस्त को ड्राइंगरूम में छोड़कर वे अंदर एक कैसेट लेने गए थे, लेकिन कैसेट देखते-देखते उन्हें बेचैनी हुई और वे लेट गए। बस, मुश्किल से दो मिनट लगे होंगे… मैं समझ रहा था कि उनका कफन-दफन वहीं हो चुका होगा। हम लोग रो-धोकर चुप भी हो चुके थे। कोई दस-बारह दिनों के बाद जब भाभी और बच्चों को लेने मैं बंबई पहुँचा तो मुझे गुमान भी नहीं था कि वे नाइजीरिया से हसीन भाई का ताबूत लेकर आई हैं। फिर सबके जख्म खुले, फिर एक बार नए सिरे से मातम हुआ…”

“और नसीब की संगदिली तो देखो,” थोड़ी देर ठहरकर जमील कहने लगा, “इसे तब होना था जब वे लौटने को ही थे। अभी छह महीने पहले जब वे यहाँ आए थे तो कहने लगे – बस कुछ दिनों की बात और है, इस कांट्रैक्ट के खत्म होने के बाद मैं हिंदुस्तान लौट आऊँगा। कहने लगे – अब और वहाँ नहीं रहा जाता। कुछ भी कहो अपना मुल्क फिर भी अपना मुल्क है… उन्होंने यहाँ ‘शिमला-हिल्स’ में अपनी पसंद का शानदार मकान बनवा लिया था। लौटने के बाद वे यहाँ क्या करेंगे, यह तय हो चुका था और वे बेहद खुश थे। तब उन्होंने कभी सोचा होगा कि जिस घर की एक-एक ईंट उन्होंने इतने प्यार से रखवाई थी, उसमें वे कभी नहीं रह पाएँगे…

पिछली बार एक अजीब बात हुई थी। पिछली बार जब मैं उन्हें एयरपोर्ट छोड़ने गया था तो ज़िन्दगी में पहली बार एक हुमक-सी उठी थी। एकाएक जी में आया था कि उन्हें बहुत जोर से भींच लूँ, एकदम कलेजे से लगाकर, लेकिन फिर लगा कि यह कोरी जज़्बातियत होगी। हसीन भाई कौन हमेशा के लिए जा रहे हैं और अपने को रोककर मैंने वह मौका हमेशा के लिए खो दिया। अब वही तकलीफ इतनी बड़ी कसक बन गई है कि हर वक्त मुझे तंग करती रहती है। क्या तुमने कभी सोचा है कि हम हर वक्त किसी ज़ोम, किसी बौद्धिक गिरह या एक नामालूम-सी ज़िद के तहत ऐसे अवसरों को खोते रहते हैं। जिनमें अक्सर वह आदमी छिपा होता है। हम उन्हें आगे के लिए मुल्तवी कर देते हैं – बिना यह जाने कि वे हमारी ज़िन्दगी जिंदगी में फिर कभी नहीं आएँगे…”

कनीज ने पान की तश्तरी मेरी तरफ बढ़ा दी। वह कब पानदान लेकर आ बैठी थी, मुझे पता नहीं था। मैंने चुपचाप पान ले लिया।

मैं जानता था कि जमील ने मुझे कहीं गहरे छू लिया है। लेकिन क्या वह सिर्फ छूना था, अपनी गिरफ्त में लेकर निचोड़ना नहीं? मैं सामने की दीवार की ओर देखने लगा, जिस पर तुगरा लगा हुआ था – अल्लाह-अल्लाह, अल्लाह… देखते हुए।

फिर तस्वीरें आईं हसीन की। हसीन भाई अपने बाग में तीनों छोटे बच्चों के साथ। हसीन भाई अपनी गाड़ी में स्टीयरिंग के सामने जबकि भाभी कार का दरवाजा पकड़े खड़ी हैं। मैंने वह तस्वीर उठा ली जो इधर हाल की थी – शायद यहाँ की। उसमें सिर्फ हसीन था, सिर्फ उसका हँसता हुआ चेहरा। तस्वीर में वह बहुत तेजी से बुढ़ाता हुआ लगा और यह देखकर ताज्जुब हुआ कि उसके चेहरे पर संपन्नता की की छाप नहीं थी। उल्टे वह एक पेड़ की तरह सूख रहा था। वह पहले से कहीं ज्यादा गंजा हो गया था। और उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी।

“यह तो यहीं की लगती है?” मैंने कहा।

“हाँ वह इसी जगह लेटे थे और मैंने तस्वीर ले ली थी। अभी पिछली बार।”

“इसमें हजामत क्यों बढ़ी हुई है?”

“इधर इन्होंने दाढ़ी रख ली थी। तुम उनसे कब मिले थे?”

“तीन-चार साल पहले, यहीं पर। उस बार मैं दिल्ली से आया था, तो इत्तफाक से वह यहीं था। बीच में एकाध बार अपने वीजा वगैरह के सिलसिले में दिल्ली आया तो उसने खबर भेजी थी, और मेरे घर भी पहुँचा था, लेकिन मैं जाने कहाँ उलझा हुआ था कि वक्त पर नहीं पहुँच सका और वह बिना मिले चला गया।”

मैं जमील से साफ झूठ बोल रहा था। सच तो यह है कि मैं हसीन से मिलना नहीं चाहता था। और उसे जान-बूझ कर टाल गया था। शायद मैं उससे बचना चाहता था, पता नहीं क्यों। हालाँकि मैं उसी की तस्वीर हाथ में लिए बड़ी देर से देख रहा था और मुझे एक बेचैन करने वाली और नामालूम-सी तकलीफ हो रही थी।

“मालूम है जब मुझे दौरा पड़ा तो डाक्टरों ने क्या पूछा था?”

जमील मेरी ओर देखने लगा। कनीज वहाँ से जा चुकी थी और हम दोनों अकेले थे।

“कहने लगे, बताइए, जिस दिन आपको यह तकलीफ हुई उस दिन या उसके दो-एक दिनों में क्या हुआ था? किसी तरह का तनाव, कोई सदमा, कोई ऐसी-वैसी खबर जिसने आपको डिस्टर्ब किया हो? मैंने कहा, नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं। यह ठीक है कि मेरठ में दंगे हो रहे थे लेकिन वहाँ मेरा कोई अज़ीज़ नहीं था। यह भी सही है कि पुरानी दिल्ली में तनाव था और कर्फ्यू लगा हुआ था, लेकिन मैं तो नई दिल्ली में रह रहा था।”

फिर मैंने कुछ सोचकर जमील को बता दिया था, यह कहते हुए कि “वह मेरा दोस्त जरूर था, लेकिन इधर कई बरसों से हम दोनों एक-दूसरे से बहुत दूर हो गए थे।” अब लगता कि पता नहीं उस बात में कहाँ तक सच्चाई थी। “सच तो यह है कि सब-कुछ के बावजूद हसीन एक साफ, ईमानदार और नेक आदमी था और मैं उसे बहुत प्यार करता था, बहुत…”

और यह कहते-कहते मैंने देखा कि मेरा गला रुँध गया है, आँखें भर आई हैं और मैं सचमुच रोने लगा हूँ…

हाँ, सचमुच!

यह भी पढ़ें: इस्मत चुग़ताई का संस्मरण ‘दोज़ख़ी’