दस का पुराना नोट

उम्र यही कोई साठ साल रही होगी। रंग सांवला और बाल पूरे सफेद हो चुके थे। पान खाती थी और पूरे ठसक से चलती थी। रिश्ते में हबीब की अम्मा थी, लेकिन पूरे मुहल्ले की नानी। जाने कहां से आकर बस गयी थीं। लेकिन, व्यवहार में इतनी मिठास थी कि ऐसा लगता मानो अपनी ही कोई दूर की रिश्तेदार हो।

नब्बे का दशक था। देश जल रहा था। लेकिन हबीब की अम्मा का सारा बिजनेस हिन्दुओं के रिवाज पर टिका हुआ था। दुकान के नाम पर उनके पास एक छोटी सी लोहे की संदूक थी। उस संदूक में दुनिया भर को सजाने का सामान भरे हुए वो मुहल्ले के चौराहे पे अपना दुकान लगाती। चवन्नी की टिकुली, अठन्नी की लिपस्टिक, रुपये का मांगटीका। फीता, कैंची, सितारे, नथुनी, बिछिया, मेंहदी, आलता… सब कुछ जो औरत को सजा देती थी, अम्मा बेचती थी। गरीबों का मुहल्ला था। किसी की बेटी आयी हो, किसी की बहू आयी हो.. सबकी सुंदरता का दुकान हबीब की मां की दुकान। किसी के पास पैसे हो न हो… कोई फर्क नहीं पड़ता। जैसे उनकी दुकान चलती थी, वैसे ही उनका काम भी चल जाता। दिन भर धूप में बैठ के समान बेचती। शाम होते ही बक्सा लादे मुहल्ले में चली आती। कभी-कभी मेरे बाबू जी के पास बैठ जाती। हाल समाचार लेती। पान खाती। और फिर चली जाती। उनकी दुकान चलती जाती… व्यवहार बनता जाता.. समय भी यूं ही कटता जाता।

उन्ही दिनों देश ग्लोबल हुआ जा रहा था। विदेशी समान और बड़ी दुकानों का केंचुआ धीरे-धीरे बड़े शहरो को अपने लपेट में लेते-लेते हमारे छोटे से बाजार में भी घुस गया। संदूक वाली मिठास से भरी दुकान के इर्द-गिर्द मोटे पैसे वालों की दुकान खुल गयी। मुहल्ले को सजाने वाली चीज़ों की दुकानें बड़ी-बड़ी खुलने लगी। ऐसा लगता कि संदूक की दुकानें अब दम तोड़ देगी। लड़कियों की भीड़ बड़ी दुकानों पर जाने लगी। संदूक पर मक्खियां भिनभिनाने लगी। उम्र जो अभी तक असर नहीं कर रही थी, अब हबीब की माँ को चपेट में लेने लेगी। जैसे-जैसे भीड़ कम और धंधा मन्दा पड़ने लगा, हबीब की मां की कमर वैसे-वैसे झुकने लगी।

एक दिन वो भी आया कि उनकी दुकान पूरी तरह से बन्द हो गयी। कल तक जो ठसक से चलती थी, वो अब झुक के चलने लगी। चेहरे पर झुर्रियाँ पड़ने लगी। पान खाती तो मुंह के किनारे से बहकर चेहरे पर बदरंग लगने लगा।

इधर कई दिनों बाद गांव जाना हुआ। एक रोज शाम में उनको देखा। हबीब की मां मेरे दरवाजे पर बैठी हुई थी। माँ ने बताया कि हबीब कुछ करता नहीं है। इसलिए अब दरवाजे मांगकर खाती हैं। वो दिसम्बर की सर्द शाम थी। मां ने रोटी दी, अचार दिया। उन्होंने खाया नहीं। साड़ी की छोर में बांध लिया। थोड़ी देर बात की और जाने लगी। अचानक जाने क्या सूझा मुड़कर आयी और बोली- ए रमेश बो… दस गो रुपया दे द! माँ ने दस की एक पुरानी नोट निकाली। हबीब की माँ ने उसे मुट्ठी में बांधा और चली गयी।

अगले दिन सुबह ही सुबह गांव में हल्ला हुआ कि हब्बीब की मां की लाश रेलवे स्टेशन पे मिली है। मां को लेकर देखने गया। चेहरा और काला पड़ गया था। शायद ठंड लगने से हार्ट अटेक आ गया था। हाथ की मुट्ठी बंधी हुई थी। दस का पुराना नोट अंदर से झांक रहा था।

माँ ने कहा- “किसी जन्म का उधार रहा होगा!”