जाने डगर में जाकर
अनजाने राह में भटककर
थोड़ा रुककर
सुस्ताकर
क्या बेझिझक
याद नहीं करते हो अपना घर?

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आयुष मौर्य
बस इतना ही कहना "कुछ नहीं, कुछ भी नहीं "

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