ये लफ़्ज़ उसी मौसम का है
जब तुम हम रोया करते थे
अपने अपने आसमानों में
जब तारे सोया करते थे

और गर्दिश चन्दा मामा की
कुछ ज़र्रे करते रहते थे
परेशान से वो परेशान फ़लक
परेशान से तुम हम रहते थे

सड़कें बिस्तर सब सूने थे
बेरंग सा था महताब बहुत
मैं जागा शबे तमाम भी हूँ
थी मिरे प्याले में शराब बहुत

रातें मिरी मीत और मैं मिलकर
नग़मे फ़ुरक़त के गाते थे
चढ़ी आती सहरों को भी
बिगड़े सुर-ताल सुनाते थे

बिछा के चादर सुर्ख़ी सी
आफ़ताब भी उमड़ा आता था
जो टाक लगाकर देखो तो
घूमा फिसला सा जाता था

कभी बादल घिर घिर आएँ तो
यादें-वादें बरसाएँ तो
मैं छिप सा कहीं पर जाता था
भीगें तू साथ नहाए तो

तेरे साथ की सारी क़िल्लत थी
तू पास भी थी पर साथ न थी
तेरी बाज़ू पकड़ कर रोया था
कोई बातों में से बात न थी

ख़ुशबू ख़ुशबू मंज़र मंज़र
तितली चिड़ियाँ उड़ आएँ उधर
फूलों की चादर चाक जिगर
ले बैठा तेरी बात जिधर

तू ठहरे पलों सी लगती थी
और गुज़र ज़माना जाता था
चाय के दीवाने प्यालों में
मुझे क़िस्सा सुनाना आता था

दरिया नदिया सी ग़ज़ल थी तू
मैं नज़्म शजर की छाँव की
क़ुदरत सी महकती तरन्नुम में
छनकी पायल तेरे पाँव की

प्याला प्याले से टकराया
अफ़्साना थोड़ा छलक गया
किरदार मिले बरसात हुई
मिट्टी मौसम सब महक गया

छुरियाँ छुरियाँ फिर लड़ ही पड़ीं
निकले ख़ंजर तलवारें खुलीं
जज़बातों का तूफ़ाँ आया
मुहब्बत की बौछार खुली

यूँ रब्त के अब इमकान बहुत
महरूमियाँ और पहेलियाँ
आज साथ हो लेकिन पास नहीं
हिज्रा तेरी अठखेलियाँ!