तुम अगर मिल सकती होतीं
या मैं तुमसे मिल सकता होता
तो ज़रूर मिल लेते
बावजूद हमारे बीच फैले घने कोहरे के
इसी में ढूँढते हुए हम एक-दूसरे का हाथ पकड़ते
छूने से पहचान जाते और कोहरे में ही गुम हो जाते
पहले की ही तरह ऐसे कि कोहरे को भी न मिलते

तेज़ बौछारों में निकल पड़ते एक-दूसरे के लिए
कनपटी से कान उखाड़ ले जाने वाली
चाकू आँधी में निकल पड़ते एक-दूसरे के लिए

मिलना छोड़ो हम दिखते तक नहीं कहीं
जैसे मैं इस धरती पर जीवित नहीं
जैसे तुम इस धरती पर जीवित नहीं

चाँद के बारे में पृथ्वीवासियों को जैसी जानकारियाँ हैं
वैसी ही जानकारियाँ हैं हमें एक-दूसरे के बारे में
हमें नहीं पता सच क्या है और वह कैसा महसूस होता है…

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प्रभात
जन्म- १० जुलाई 1972. कविताएँ व कहानियाँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। २०१० में सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार और भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार और २०१२ में युवा कविता समय सम्मान। साहित्य अकादमी से कविता संग्रह 'अपनों में नहीं रह पाने का गीत' प्रकाशित।