शरीर में दिल है
सो धड़कता है
मगर इन दिनों
वजह दूसरी है

धरती पर कोई है
जिसके होने की आहट से
यह धड़कने लगता है

क्या अब ऐसा होगा
कि शरीर न हो तो भी चलेगा
दिल अब किसी दूसरी
और शरीर से कुछ अधिक प्रिय वजह से धड़केगा

मैं अपने भीतर
और अपने से बाहर
और अपने आप ही
एक घोंसला बुनने लगा हूँ
जिसमें यह दूसरी वजह से धड़कने वाला दिल
और इसके धड़कने की वजह
दोनों महफू़ज़ रह सकें

मैं घोंसला बुन रहा हूँ यह जानते हुए भी
कि घोंसलों को आँधियाँ बखेर देती हैं

आज यह पूरे दिन उसी दूसरी वजह से धड़कता रहा है
शरीर का इसने पानी भी नहीं पिया है

डर भी रहा हूँ कि कल को यह दूसरी वजह
रूठ जाए तो क्या होगा इस नाज़ुक का
शरीर में यह लौट नहीं पाएगा
बाहर यह बच नहीं पाएगा

स्मृतियाँ रह जाएँगी केवल

स्मृतियाँ जो जिन वजहों के लिए बनती हैं
उन वजहों के मिटने पर बनती हैं

यही वजह है शायद
सबसे मीठी स्मृतियों का रंग
सबसे ज़्यादा उदास होता है

देखो उदासी के उस रंग ने
कितना अपने में डुबो लिया है उस दिल को
जिसका धड़कना शुरू होना
दो दिन पहले की बात है!

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प्रभात
जन्म- १० जुलाई 1972. कविताएँ व कहानियाँ देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित। २०१० में सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार और भारतेन्दु हरिश्चंद्र पुरस्कार और २०१२ में युवा कविता समय सम्मान। साहित्य अकादमी से कविता संग्रह 'अपनों में नहीं रह पाने का गीत' प्रकाशित।

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