Tag: प्रेम

Prabhat

प्रभात की कविताएँ

प्रस्तुति: विजय राही तुम तुमने कहना नहीं चाहा लेकिन कहा पेड़ से बाँध दो इसे खाल उधेड़ो इसकी इच्छा पूरी करो बस्ती की। बाक़ी मुझे बेच दो या शादी करो रहूँगी तो इसी की कौन...
Woman crying, Tears

वो जो कोई थी

वो जो कोई थी किसी ज़माने में मेरी उम्र के सफ़ेद और काले पन्नों के बीच किसी सतरंगी चित्र-सी जिसका तय था सम्बन्ध हमारे मिलने के बहुत पहले से ही, बनना था...
Vijay Rahi

शहर से गुज़रते हुए प्रेम, कविता पढ़ना, बेबसी

शहर से गुज़रते हुए प्रेम मैं जब-जब शहर से गुज़रता हूँ सोचता हूँ किसने बसाए होंगे शहर? शायद गाँवों से भागे प्रेमियों ने शहर बसाए होंगे ये वो अभागे थे, जो फिर लौटना...
Woman

क्या तुमने, प्रेम एवं विवाह, चरित्रहीन

क्या तुमने उसकी कमर टटोलने से पहले क्या तुमने टटोली हैं उसकी हथेलियाँ? उसके अधर चूमने से पहले क्या तुमने चूमा है उसका माथा? क्या तुमने कभी उसके सीने को स्पर्श किए बिना स्पर्श किया है उसका हृदय? प्रेम एवं विवाह प्रेम...
Couple, Silhouette

अश्रु और स्वेद के नामक में है फ़र्क़

प्रिय मिलन की उत्कण्ठा में दौड़कर पहाड़ लाँघ गयी थी प्रिया, आपादमस्तक स्वेद से सनी हुई जब प्रियतम के गले लगी तब स्वेद की नैसर्गिक गन्ध से सुवासित हो...
Girl, Rose

आइसोलेशन में प्रेमिकाएँ

पेड़, नदी, पहाड़ और झरने प्रेमिकाएँ उन सबसे लेती हैं उधार एक-एक कटोरी प्रीत और करघे की खच-खच में बहाती हुई अपनी निर्झरिणी वे बुन डालती हैं एक ख़ूबसूरत कालीन जिसमें मौजूद...
Paash

तुम्हारे बग़ैर मैं होता ही नहीं

तुम्हारे बग़ैर मैं बहुत खचाखच रहता हूँ यह दुनिया सारी धक्कम-पेल सहित बेघर पाश की दहलीज़ें लाँघकर आती-जाती है तुम्हारे बग़ैर मैं पूरे का पूरा तूफ़ान होता...
Kishor Kabra

तन के तट पर

तन के तट पर मिले हम कई बार, पर द्वार मन का अभी तक खुला ही नहीं, डूबकर गल गए हैं हिमालय, मगर जल के सीने पे...
Sand, Beach, Foot Prints

पोंछना

ना ठीक-ठीक फूल-सी नाज़ुक ना ही पत्तियों-सी चंचल किसी बड़ी बात की तरह भी नहीं, क्रिया के बाद बची रह गयी किसी अनन्य क्रिया की तरह है पोंछने की...
Akhileshwar Pandey

उम्मीद

'Ummeed', a poem by Akhileshwar Pandey रेत नदी की सहचर है जो पत्ते चट्टानों पर गिरकर सूख रहे होते हैं उन्हें अकेलेपन का नहीं, हरेपन से बिछुड़ने का दुःख सता...
Sensual Hands, Intimate

किसी ठहरी हुई साँझ की क़लम से

जब कई साँझ जला और स्याह कर कई सवेरे, मैं मान लेती हूँ ख़ुद से हार और अनजाने में पुकार उठती हूँ एक बार फिर तुम्हारा नाम, तब तुम्हारा यह...
Sahir Ludhianvi

ख़ूबसूरत मोड़

'Khoobsurat Mod' - Sahir Ludhianvi चलो इक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों न मैं तुमसे कोई उम्मीद रखूँ दिलनवाज़ी की न तुम मेरी तरफ़...

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