Tag: प्रेम

Amrita Pritam

तू नहीं आया

चैत ने करवट ली, रंगों के मेले के लिए फूलों ने रेशम बटोरा—तू नहीं आया दोपहरें लम्बी हो गईं, दाखों को लाली छू गई दराँती ने गेहूँ...
Girl, Woman, Village

अलगनी पर टँगे दुःख

हर औरत ने पोषित किया प्रेम अपने तरीक़े से मेरी गली की राजाबो दिखती थीं प्रेम से तृप्त जब पति बनारसी साड़ियों के लिए रेशमी धागे...
Girl Reflection Water

मैं तुम्हें भूलने के पथ पर हूँ

मैं तुम्हें भूलने के पथ पर हूँ मुझे परवाह नहीं यदि भूल जाऊँ अपनी लिखी सारी पंक्तियाँ मैं लगातार चलती जा रही हूँ मेरे पीछे उठा मानसून भी...
Gopaldas Neeraj

धनिकों के तो धन हैं लाखों

धनिकों के तो धन हैं लाखों मुझ निर्धन के धन बस तुम हो! कोई पहने माणिक माल कोई लाल जुड़ावे कोई रचे महावर मेहँदी मुतियन माँग भरावे सोने वाले, चाँदी वाले पानी...
Sandeep Pareek Nirbhay

जाँघों के बीच

कल अरसे बाद उसके वहाँ गया था महाजन गाँव की मटकी का ठण्डा पानी पीते वक़्त सुनायी दी मुझे हारमोनियम की मीठी आवाज़ और धौंकनी चला रहे हाथ से आ...
Gyanendrapati

ट्राम में एक याद

चेतना पारीक कैसी हो? पहले जैसी हो? कुछ-कुछ ख़ुुश कुछ-कुछ उदास कभी देखती तारे कभी देखती घास चेतना पारीक, कैसी दिखती हो? अब भी कविता लिखती हो? तुम्हें मेरी याद तो न...
Kumar Vikal

एक प्रेम कविता

यह गाड़ी अमृतसर को जाएगी तुम इसमें बैठ जाओ मैं तो दिल्ली की गाड़ी पकड़ूँगा हाँ, यदि तुम चाहो तो मेरे साथ दिल्ली भी चल सकती हो मैं तुम्हें अपनी...
Shalabh Shriram Singh

औरों की तरह नहीं

अपने पिता की तरह कैसे कर सकता हूँ प्यार मैं? अपने भाई की तरह कैसे? कैसे कर सकता हूँ प्यार अपने पुत्र की तरह? मित्र की तरह...
Bodies, Sensual, Intimacy, Tattoo, Flower, Back, Lesbian, Body, Touch

प्यार का वक़्त

वह या तो बीच का वक़्त होता है या पहले का। जब भी लड़ाई के दौरान साँस लेने का मौक़ा मिल जाए। उस वक़्त जब मैं तुम्हारी बन्द पलकें बेतहाशा चूम रहा...
Rajkamal Chaudhary

रात्रिदग्ध एकालाप

1 बारूद के कोहरे में डूब गए हैं पहाड़, नदी, मकान, शहर के शहर। बीवी से छिपाकर बैंक में पैसे डालने का मतलब नहीं रह गया है अब। 2 मुझे चुप...
Bhisham Sahni

चीलें

चील ने फिर से झपट्टा मारा है। ऊपर, आकाश में मण्डरा रही थी जब सहसा, अर्द्धवृत्त बनाती हुई तेज़ी से नीचे उतरी और एक...
Paash

अब विदा लेता हूँ

अब विदा लेता हूँ मेरी दोस्त, मैं अब विदा लेता हूँ मैंने एक कविता लिखनी चाही थी सारी उम्र जिसे तुम पढ़ती रह सकतीं उस कविता में महकते हुए...

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Javed Akhtar

मेले

बाप की उँगली थामे इक नन्हा-सा बच्चा पहले-पहल मेले में गया तो अपनी भोली-भाली कंचों जैसी आँखों से इक दुनिया देखी ये क्या है और वो क्या है सब उसने पूछा बाप...
Writing

समकालीन युवा लेखन पर कुछ विचार

जब भी कोई अनुभवी लेखक किसी युवा को सम्भावनाशील लेखक या कवि कहता है, वह यही बता रहा होता है कि आप एक रास्ते...
Ahmad Faraz

ख़्वाबों के ब्योपारी

हम ख़्वाबों के ब्योपारी थे पर इसमें हुआ नुक़सान बड़ा कुछ बख़्त में ढेरों कालक थी कुछ अब के ग़ज़ब का काल पड़ा हम राख लिए हैं झोली...
Agyeya

यूरोप की छत पर : स्विट्ज़रलैण्ड

दुनिया की नहीं तो यूरोप की छत : अपने पर्वतीय प्रदेश के कारण स्विटजरलैण्ड को प्रायः यह नाम दिया जाता था—किन्तु हिमालय को घर...
Dhoomil

बीस साल बाद

बीस साल बाद मेरे चेहरे में वे आँखें लौट आयी हैं जिनसे मैंने पहली बार जंगल देखा है: हरे रंग का एक ठोस सैलाब जिसमें सभी पेड़...
James Joyce

अरबी बाज़ार

Short Story: 'Araby' Writer: James Joyce अनुवाद: उपमा ऋचा लेखक परिचय: आयरलैण्ड के रचनाकार जेम्स जॉयस (1882-1941) ने सिर्फ़ कहानियाँ ही नहीं लिखीं, उपन्यास भी लिखे और साहित्य...
Abdul Bismillah

शरीफ़ लोग

पत्थर के कोयले से जो धुआँ उठता है उसमें एक शहर महकता है सुना है उस शहर में शरीफ़ लोग रहते हैं लेकिन शराफ़त का धुएँ से क्या नाता है यह समझ...
Old Woman

खुखड़ी

"अरे देखो रे रिंकिया... दिन दहाड़े वो बुढ़िया खुखड़ी चुरा कर भाग रही है, पकड़ो पकड़ो उसे... खुखड़ी छीन कर वापस रख लेना।" रिंकिया...
Mahesh Anagh

नहीं-नहीं, भूकम्प नहीं है

नहीं नहीं, भूकम्प नहीं है नहीं हिली धरती। सरसुतिया की छान हिली है कागा बैठ गया था फटी हुई चिट्ठी आयी है ठनक रहा है माथा सींक सलाई हिलती है सिंदूर माँग...
Adil Mansuri

सियाह चाँद के टुकड़ों को मैं चबा जाऊँ

सियाह चाँद के टुकड़ों को मैं चबा जाऊँ सफ़ेद सायों के चेहरों से तीरगी टपके उदास रात के बिच्छू पहाड़ चढ़ जाएँ हवा के ज़ीने से तन्हाइयाँ...
Nirmala Putul

तुम्हें आपत्ति है

तुम कहते हो मेरी सोच ग़लत है चीज़ों और मुद्दों को देखने का नज़रिया ठीक नहीं है मेरा आपत्ति है तुम्हें मेरे विरोध जताने के तरीक़े पर तुम्हारा मानना है कि इतनी...
Ishrat Afreen

मेनोपॉज़

अजीब-सी इत्तिला थी वो जिसे मैं ख़ुद से न जाने कब से छुपा रही थी अजब ख़बर थी कि जिसकी बाबत मैं ख़ुद से सच बोलते हुए...
Safia Akhtar, Jaan Nisar Akhtar

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