अच्छी दुनिया

रहे हैं अच्छी दुनिया के मायने हमेशा से—
खिले फूल और तितलियाँ,
उड़ती चिड़ियाँ और हरे पेड़।
हँसते-खिलखिलाते बच्चे और उनके खेल,
प्रेम में डूबे हृदय और हवा में सिक्त उनकी गंध।
चुहल करते निकलती मज़दूरों की टोली,
और धान रोपती स्त्रियों के गीत।
पेट-भर भोजन की आश्वस्ति,
और सपनों की सीढ़ी बनती किताबें।

इन सबके ख़िलाफ़ है—
युद्धों का होना।
चलो दबा दें मिट्टी में सभी बन्दूक़ें
और उगा दें वहाँ इस अच्छी दुनिया के सलीक़े।

मातृभाषा

मेरी भाषा में वे शब्द नहीं
जो प्रगट कर सकें इस विविध दुनिया के सारे सत्व
इसीलिए जीते और जागते हुए
बरतता हूँ मैं
दूसरी भाषाओं के भी शब्द

इस बड़ी दुनिया में भी नहीं है इतनी गुरुत्व
सिवाय मेरी भाषा के
जो झेल सके मेरी आत्मा का घनत्व

इसलिए सबकुछ रखकर किनारे
मैं अक्सर बैठ जाता हूँ और सो भी जाता हूँ
अपनी भाषा के साथ
निष्कपट।

भीतर अभी भी तुम हो

मेरी आत्मा के परकोटे पर
ये जो उड़ रहे हैं सफ़ेद कबूतर,
मेरी मुक्ति के नहीं
तुम्हारी चाहना के सूचक हैं।

हृदय के कूप से
जो उठ रहा है हूक का स्वर,
बिछोह में पड़े पपीहे की टेर नहीं
स्मृतियों के कोयल की मीठी कूक है।

झुक रहे कंधों पर
ज़िन्दगी के कारनामों की फेहरिस्त है,
पलटना समय मिले तो
इसमें तुम्हारी स्याही से लिखा हर एक हर्फ़ है।

जब लौटना तब मत देखना
आँखों के नीचे लटककर बुझ चुके इन दो चाँदों को।
भीतर अभी भी तुम हो पूनम के उजास-सा,
ये तो जलते हुए दीये के नीचे का तमस है।

शाप

ये जो चुभती हैं तुम्हें,
तुम्हारी आँखों में पसरे उपेक्षा के रेगिस्तान में
उगी मेरी ही कामनाओं की नागफ़नी हैं।

समझा करो प्रिय,
आख़िर वे नरम घास या फूल कैसे बनतीं
जब पा न सकीं तुम्हारे अपनत्व से भरे स्पर्श का ताप,
तुम्हारी नेह की कुछ बूँद और गेह की मिट्टी।

ये तो फल है मेरी प्रतीक्षा के तप से उपजी शक्ति का
जो खड़ा हूँ लिए इतना हरापन।
ये सारे काँटे अवलम्ब बनेंगे एक दिन
जिन पर लहराएँगी मेरे प्रेम की पताकाएँ।

एक बात कहूँ—
ये तो कमाल है तुम्हारी अनुपस्थिति का,
जिसके नाश की कामना से
सभी रंध्र किये बंद बचाए हुए हूँ ख़ुद को।
कहाँ बचा पाता स्वीकार में यूँ
भाप-सा उड़ गया होता कब का।

हालाँकि कभी भी चाहा नहीं है मैंने
इस तरह बचे रहना,
प्रेम में बच जाना एक शाप ही तो है।

स्थगन

कुएँ की जगत पर बैठा मेंढक
कूद जाएगा उसमें ही
और बंध जाएगा ताउम्र उससे
छोड़कर सब काम उसे रोको उर्मिल

स्थगित कर दो अपना चुम्बन
कि देखकर हमें चिड़ियाँ हो रहीं है बेकल
उनके चिड़े कहीं दूर गये हैं
लौटेंगे देर शाम

अरे रुको, देखो तो उसे
बढ़ी जा रही है उस ओर
जिधर बिछा रखा है बहेलिए ने जाल
हिरणी को क्या पता कि जंगल में अब
जानवर से ज़्यादा इनसान आ गये हैं
ये बताओ उसे कैसे भी उर्मिल

देखो उर्मिल
हमें हमारे प्यार में सिर्फ़ एकान्त नहीं
ये भरी-पूरी दुनिया भी चाहिए
भला बिना इनके
हम कैसे करेंगे प्यार
क्यों कर करेंगे प्यार उर्मिल!

तब जानोगे

जब उड़ोगे तब जानोगे
कि जाने कब से हो तुम
ज़िन्दगी के पिंजरे में।

चलोगे तब पता चलेगा
कि पैरों में पड़ी हैं
जाने कितनी मजबूरियों की बेड़ी।

जगोगे तब समझोगे
कि अब तक जिसे समझे थे हक़ीक़त
सब सपना था या भ्रम।

पढ़ोगे तो महसूस करोगे
कि कितनी ही आवाज़ें
इतिहास के पन्नों में नहीं हुई हैं दर्ज।

उठाओगे सिर तब देखोगे कि
जितनी धरती है दो क़दमों तले
उससे कहीं आगे क्षितिज तक है उसका विस्तार।

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आलोक कुमार मिश्रा
जन्म तिथि: 10 अगस्त 1984 जन्म स्थान: ग्राम- लोहटा, पोस्ट- चौखड़ा, जिला- सिद्धार्थ नगर, उत्तर प्रदेश शिक्षा: दिल्ली विश्वविद्यालय से एम ए (राजनीति विज्ञान), एम एड, एम फिल (शिक्षाशास्त्र) व्यवसाय: दिल्ली के सरकारी विद्यालय में शिक्षक (पी जी टी, राजनीतिक विज्ञान) के पद पर कार्यरत। रुचि: समसामयिक और शैक्षिक मुद्दों पर लेखन, कविता-कहानी लेखन, कुछ पत्र-पत्रिकाओं में समय-समय पर प्रकाशित भी हो चुकी हैं जैसे-जनसत्ता, निवाण टाइम्स, शिक्षा विमर्श, कदम, कर्माबक्श, किस्सा कोताह, परिकथा, मगहर, परिंदे, अनौपचारिका, वागर्थ, हंस आदि में। बोधि प्रकाशन से कविता संग्रह 'मैं सीखता हूँ बच्चों से जीवन की भाषा' प्रकाशित। तीन पुस्तकें अलग-अलग विधाओं में प्रकाशनाधीन।

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