औरतों को ईश्वर नहीं
आशिक नहीं
रूखे फीके लोग चाहिए आस पास
जो लेटते ही बत्ती बुझा दें अनायास
चादर ओढ़ लें सर तक
नाक बजाने लगें तुरंत

नजदीक मत जाना
बसों ट्रामों और कुर्सियों में बैठी औरतों के
उन्हें तुम्हारी नहीं
नींद की जरूरत है

उनकी नींद टूट गई है सृष्टि के आरम्भ से
कंदराओं और अट्टालिकाओं में जाग रहीं हैं वे
कि उनकी आँख लगते ही
पुरुष शिकार न हो जाएँ
बनैले पशुओं/ इनसानी घातों के
जूझती रही यौवन में नींद
बुढ़ापे में अनिद्रा से

नींद ही वह कीमत है
जो उन्होंने प्रेम परिणय संतति
कुछ भी पाने के एवज में चुकायी
सोने दो उन्हें पीठ फेर आज की रात
आज साथ भर दुलार से पहले
आँख भर नींद चाहिए उन्हें।

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अनुराधा सिंह
जन्म: 16 अगस्त, उत्तर प्रदेश। शिक्षा: दयालबाग शिक्षण संस्थान आगरा से मनोविज्ञान और अंग्रेज़ी साहित्य में स्नातकोत्तर। प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में कविताएँ, अनुवाद व आलेख प्रकाशित। पत्रिकाओं के विशेषांकों, कवि केंद्रित अंकों, विशेष स्तम्भों के लिए कविताएँ चयनित व प्रकाशित। सम्प्रति मुंबई में प्रबंधन कक्षाओं में बिजनेस कम्युनिकेशन का अध्यापन।

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