जानवर भी अब सहमे-सहमे से रहते हैं,
सुना है कि यहाँ इंसानों की बस्ती है।

ज़िन्दगी का हर मोड़ एक प्रश्न है,
चाहे जितनी ले लो, मौत बहुत सस्ती है।

अँधेरा तो फिर भी सुहा जाता है कुछ,
पर रौशनी आँखों को बहुत चुभती है।

हथेलियों की रेखाओं में भाग्य देखते हैं,
लोगों की क़िस्मत भी कुंडलियों में ढलती है।

ज़िन्दगी की परिभाषा बहुत स्पष्ट है,
नदी किनारे लाश धू धू जलती है।

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