आमंत्रण की कला

दस्तक का आधा रस किवाड़ सोख लेता है
शेष आधा टपक जाता है
पककर इस ऋतु
ऊपर के ताखे में संकोच रखकर सोती है देह
अलमारियों में पंचांग का शोक

जैसी उसकी भाषा है
आधे में जल पर चंद्र दिखायी देता है
बचे आधे से ही तो जीवन पर्यन्त
छोटी-छोटी हांडी भरती है वो
पाँच मसालों की होती है पाँच इन्द्रियाँ
खदकती एक संग श्वास की अग्नि में
रसोई में खिचड़ी होती है बासी सूंघ-सूंघ अपना कलेवर
श्वान को जीमाती है
छपाके से नहलाती है अपना चौका सूर्योदय पूर्व

आमंत्रण की कला में इतना जानती है
कि देहरी पर बैठना है तुलसी पत्ते की चाय लिए
पल्लू की किनोर में दालमोठ बांधे

अस्त होता है मन
फिर अस्त होने की थकन भी होती है अस्त

बड़बड़ाती है, दस्तक का कोई मोह करता है भला –
जो कोई आता भी हो तो क्या पूछेगा
क्या तुम ही वो गृहिणी
जिसने अभ्यागत को लिखी थी कविता
नवरात्र के पहले दिवस?

कहलवाया है उसने

कहलवाया है उसने
आ रहा है अंतिम संगीत लेकर

और मैं कितनी कातर
निर्जन से घर में कैसे डोलती हूँ
क्या-क्या न जलाया
पीली ढिबरी, फिर चूल्हा
फिर फिर अपना पीला मन

नव रस की भागी
सौ मुद्राओं की अभिलाषी

अभी कालिख उतारी देह दृष्टि पर
आएगा वो
भरेगा अंजन

दमदम के नभ पर मेघ छाए है

किताब के भार से आधे दाम, थैली में खरीद लायी
नैवेद्य और गुड़
कालिदास की शकुंतला का रक्त पीला पड़ गया था
सुगठित ग्रंथावली की मज्जा में
घट पड़ गए जगह-जगह
लोग जन दो जून के भात को मरते थे
मैं अभागी बांचती रही थी कैसे ही क्षत हो गयी सुंदरी सती की देह

जिस देस में मद्य का निषेध हो
वहीं जाते हैं अल्प वय वाले पुरुष
और तारापीठ की गलियां थी इतनी ही संकीर्ण
जहाँ कुछ न था सिवाय अघोर प्रेमियों के
सिवाय गहन अन्धकार के
ज्यों तुम्हारा ह्रदय था पूजन के पहर

लौट आती थी मैं सब चढ़ा कर देवी को
ट्रेन में पास बैठा रसिक कवि कह पड़ा –
भान होता है दमदम के नभ पर मेघ छाए है
मैं इतना ही सोचती थी, बुदबुदाते –

ठीक ही किया जो बेच आयी बही
ज्ञान का कैसा आलोक !
बिरखा का स्वच्छ जल मिल जाता है पोखर में
फिर उस पर तुम भैरव, प्रलय करते हो प्रणय के!!

भवसागर

कोई ऐसे भी विवश करता है क्या
सामने कूप है, दोल है
किन्तु शुक लिए बैठा साधक कहता है
ध्यान धरो अर्ध नग्न हिम श्रृंगों का
सोचो उत्तर मुख किये निद्रालीन देवों का
मर जाओ पिपासा से

सामने वो है
भुजाएं हैं उसकी खुली
किन्तु ये जन्म व्यर्थ करो पहले
काशी घाट पर माला फेरते

कोई ऐसे छोड़ आता है मझधार में क्या
उस पार मृत्यु को भी उतना ही समय लगे
जितना इस पार छूटी पुरातन देह धारते

तुम्हारे शुक उड़ जाएँ
फिर मैं तर जाऊंगी भवसागर

कंठ से स्वर आता है किंचित जलते शव जैसा
किन्तु हंसकर कहती हूँ अभी –
तुम कितने जीव पकड़ोगे
किसे-किसे अन्धकार की नौका से पार कराओगे संसार
देखूँगी

तत्पश्चात मिलना मुझसे

तत्पश्चात मिलना मुझसे
त्वरित ग्रास की तरह
मेरे भय को सम्पूर्ण निगल जाने को उद्धत

तटबंधों पर विचरते
धवल, निर्मल बगुलों की तरह
कौंध जिनकी रह जाए निर्लिप्त खेलते वक्ष पर
मेरे मुक्ता हारों में

हथिया लेना उसके बाद
मेरा आद्र कंठ स्वर
मेघों की तरह अधर को आधार देकर

तत्पश्चात मंदार के घनघोर अन्धकार समान मिलना
अपनी आदिम कंदराओं में जिनका सापेक्ष स्वर
जन्म से सुना मैंने

अंतत: संधानरत मृदुल मनीषी से मिलना
अडिग विश्वास लेकर
इस बार सिद्ध कर ही मानोगे मेरी गृहस्थी
मानों प्रतिष्ठित हैं मेरे सब अंग
तुम्हारे अंगों में..

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