मेरे लिए कविता रचने का
कोई ख़ास क्षण नहीं।
मैं कोई गौरय्या नहीं
जो सूर्योदय और सूर्यास्त पर
घौंसले के लिए
चहचहाना शुरू कर दूँ।

समय ही ऐसा है
कि मैं जीवन की लय बदलूँ—
छंद और रूपक भी
एक मुक्त संवाद—
आत्मीय क्षणों में कविता ही है
जहाँ मैं—
तुमसे कुछ छिपाऊँ नहीं।
सुन्दर चीज़ों को अमरता प्राप्त हो
यही मेरी कामना है
जबकि मनुष्य उच्च लक्ष्य के लिए
प्रेरित रहें!

हर बार मुझे तो खोना ही खोना है
क्योंकि कविता को जीवित रखना
कोई आसान काम नहीं
सिवाय जीवन तप के।

जो कुछ कविता में छूटता है
मैंने चाहा कि उसे
रंग, बुनावट, रेखाओं और दृश्य-बिम्बों में
रच सकूँ।

धरती उर्वर है
हवा उसकी गंध को धारण कर
मेरे लिए वरदार!

गाओ, गाओ—ओ कवि ऐसा,
जिससे टूटे और निराश लोग
जीवन को जीने योग्य समझें।

हृदय से उमड़े हुए शब्द
आत्मा का उजास कहते हैं।

 विजेन्द्र की कविता 'वहाँ देखने को क्या था'

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विजेन्द्र
वरिष्ठ कवि व आलोचक।

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