मैं उन इलाक़ों में गया
जहाँ मकान चुप थे
उनके ख़ालीपन को धूप उजला रही थी
हवा शान्त, मन्थर—
अपने डैने चोंच से काढ़ने को
बेचैन थी
लोग जा चुके हैं
उन्हें कुछ बाहुबलियों ने
फ़िलहाल खदेड़ दिया है
मुझे गहरे अकेलेपन ने आ घेरा
वहाँ देखने को क्या था
स्मृति, अनुमान, दुःख की पैनी धार
एक मटमैले ख़ालीपन की गूँज तैर रही थी
न तो वहाँ उँगलियों के छापे थे
न पाँव के निशान
मैंने देखा ख़ून के छींटे काले पड़ चुके हैं
दीवारों को छूते ही
मिट्टी झड़ी
आवाज़ आयी, ‘क्यों हमारे ज़ख़्मों को
दुखाते हो।’
ख़ाली घरों में देखे
पुराने काग़ज़ों के ढेर
टूटे-फूटे बर्तनों की पैनी किरचें
शीशे के टुकड़े
बुझी राख
चूल्हे के उधड़े कूल्हे
लगता है यहाँ से
डर के भाग गए!
तीनों टाँगों वाली कुर्सी
कोने में ऊँघ रही है
क्या इन चीज़ों को देखकर
पता लगता है
वे किस तरह रहते थे!
कितने दोआब
कितन तीर्थ अकुलाए हुए चुपचाप
इस कुल्हाड़े का पूर्वज
कहीं अंधेरे में छिपा है
हथौड़ा पहले चकमक का था
अब लौहे का
हड्डियों, चकमक और पत्थर की जगह इस्पात ने ले ली है
काल ने वही बचा के रखा है
जो सुन्दर है
जीवन में टिकाऊ भी।

***

विजेन्द्र की कविता 'धातुओं का गलता सच'

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विजेन्द्र
वरिष्ठ कवि व आलोचक।

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