मैंने हर ढलती साँझ के समय
सदा सूर्योदय की कामना की है
जब सब छोड़कर चले गए
वृक्ष मेरे मित्र बने रहे
खुली हवा… निरभ्र आकाश में
साँस लेता रहा
निखरी धूप में
फूलों ने अंग खोले
वह सूर्य-बिंदु भी मुझे दिखाओ… वह नखत-पंख
जब सबसे पहले
मेरे पूर्वजों ने सहसा, अचक
मिट्टी का हरा-स्याह ढेला फेंककर
दमकता ताँबा पा लिया
मैं हिम, पाषाण, धातु युग के पुनर्जागरण काल से
गुज़रकर यहाँ तक आया हूँ
धातुओं को रूप बदलते पहली बार देखा
ओह… जैसे अग्नि की आत्मा चमक उठी हो
कितनी हैरत में हूँ
कहाँ देख पाऊँगा उन्हें
जो चकमक के हथौड़े से धातु को पीटकर
कुल्हाड़ों के फाल…
कुदालों… बर्छियों में बदल रहे थे
कैसे हरे-भरे वृक्ष जीवाश्म बने
कुछ नष्ट नहीं हुआ
रूप और सौन्दर्य बदले हैं
मुझे खदान में उतरते किसी ने देखा
उस समय तनी रस्सियाँ… दाँतेदार बल्लियाँ
मेरी दोस्त थीं
मृत्यु का सामना था
नीचे गाढ़े अंधेरे में उम्मीद की तीखी कौंध
धुएँ की कड़वी घुटन
नन्हें से तेल के दिए की रोशनी में
अपनी साँसों का ध्रुपद सुना है
पोली चट्टानों के खिसकने से
खनिज जहाँ-के-तहाँ दफ़न हुए
हर बार दानव ने मेरी आत्मा का सौदा किया है
मुझे बँधुआ बनाकर रखा है
बहुत पुरानी खदानों में
खनिकों की गली ठठरियाँ
बड़े-बड़े खण्डों के नीचे मिली हैं
एक युग डायनासोरों का भी था
लद्धड़ सोच ने उन्हें
प्रकृति के महागर्त में बैठाया
जब चकमक के भण्डार चुके
मैंने हरे-स्याह पत्थर को आँच में तपाया
हर क्रिया में मेरा जन्मोत्सव था
नये क्षितिज, नये द्वार, नयी उषा, नया भोर
आँखों ने रोशनी की ज़ुबान सीखी
मेरा हर क़दम आगे पड़ा
आज मैं जिन अदृश्य अणुओं को
बारीक औज़ारों से तोड़ने को बैठा हूँ
उसकी शुरूआत बहुत पहले
कर चुका हूँ
न आँच बुझी है
न हाथ हारा है।

विजेन्द्र की कविता 'धातुओं का गलता सच'

Book by Vijendra: