मेरी आवाज़

बचपन से कोशिश जारी है पर अब तक
पहाड़ के पार मेरी आवाज़ नहीं जाती
पहले गूँजती थी और लम्बी यात्रा कर
टकराकर लौट आती थी

पहाड़ के इस ओर और उस पार
ऐसा कुछ नहीं बचा
जो अब मेरी अपनी आवाज़ लौटा लाए

मेरी खनकती आवाज़
अपने पास रखने वाला
वो सूखा कुआँ
अब भर चुका है
आदिवासियों की चीख़ों से

मेरी आवाज़ जिन पेड़ों पर झूलती थी
कलाबाज़ियाँ खाते हुए
वहाँ प्रेमियों की, किसानों की
आत्महत्या करने वाली रस्सियाँ बंधी हैं

बहुत से पहाड़ खप गए हैं इमारतों में
मेरी आवाज़ घुट गयी है
मोबाइल टॉवर में

रात की नीरवता टटोलती है जब
आवाज़ों का जंगल
तब सब ओर से आती हैं
हामी भरते सियारों जैसी आवाज़ें

मेरी कोशिशें लौटकर आती हैं
आवाज़ नहीं।

भेद का भाव

अंधेरे की पोटली थामे
सप्तऋषि के चौथे तारे
सबसे पहले तुम्हें खोजती है दुनिया
कितना गहरा है दो प्रकाश-पुँज के बीच का अँधेरा—
मैंने तुम्हें देखकर ये जाना

क्या वह ख़ुद से फीका था
या फीकी पड़ गयी उसकी चमक
दो चमकते सितारों के बीच

छह तारे मिलकर भी एक अकेले तारे को
सौंप नहीं सके
एक मुट्ठी उजाला।

सोनू चौधरी की कविता 'हाइवे पर बसन्त'

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