नीम-तरू से फूल झरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है

रीझ, सुरभित हरित-वसना
घाटियों पर,
व्यँग्य से हँसते हुए
परिपाटियों पर,
इन्द्रधनु सजते-सँवरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है

गहन काली रात
बरखा की झड़ी में,
याद डूबी नींद से
रूठी घड़ी में,
दूर वंशी-स्वर उभरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है

वॄक्ष, पर्वत, नदी,
बादल, चाँद-तारे,
दीप, जुगनू, देव-दुर्लभ
अश्रु खारे,
गीत कितने रूप धरते हैँ
तुम्हारा मन नहीं छूते
बड़ा आश्चर्य है!