बहुत तन्हा रहता हूँ आजकल
बस बीच-बीच में कुछ कवितायें मिलनें आती हैं
बहुत दूर-दूर से, कभी-कभी सरहदों के पार से
कभी अकेले तो कभी अनुवादकों का हाथ पकड़े
आती है मुझसे मिलनें… कवितायें!!

कुछ आते ही लिपट जाती हैं
कुछ
धीरे-धीरे दिल में उतरती हैं
कुछ तो बहुत देर तक बैठी रहती हैं साथ
और कुछ मन की डोर थामें …नदी के किनारे साथ में..
दूर तक चहलकदमी करती हैं…

कुछ तो अचानक मिल जाती हैं… कभी-कभी
शहर की धूल भरी सड़कों पर…
और कुछ तो मिलनें…
गाँव की पगडंडी तक पहुँच जाती हैं..
वही कुजों छाँव में… महुए की मीठी महक के बीच..
लम्बी गुफ़्तगूँ करतीं हैं…
फिर छोड़ जाती है… निरूत्तर..

कविताओं से मेरी.. अब अच्छी दोस्ती हो गयी है..
अब वो, बिना तुकबन्दियों के शर्त के मिलनें आती हैं

हालांकि, मैं, कविताओं के लिए..
…बहुत बेवफा आदमी हूँ
अकसर… पुरानी को भूल.. दुनियादारी में मगन हो जाता हूँ..
फिर जब होश आता है, तो…
किसी नयी कविता का दामन थाम लेता हूँ..

फिर भी…
हर बार गाहे-बेगाहे..
कभी साहस दिलाने…
तो कभी… ढाँढंस बधाँने..
कभी प्रेम तो.. कभी वैराग्य सिखाने…
आ ही जाती है कोई कविता..

कितना मुश्किल होता ये जीवन..
अगर कवितायें ना होती..
और भाषा… बिना सिरे के.. रसगुल्ले जैसी होती!

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शशि शेखर शुक्ला
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से स्नातक और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU) से परास्नातक के पश्चात , वर्तमान में भूगोल विषय में शोध में सक्रियता है। शोध और भ्रमण के साथ लेखन में अधिक रूचि है।

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