‘Kavita Virodhi Samay’, a poem by Abhigyat

यह कविता विरोधी समय है
क्योंकि
चापलूस सच नहीं बोलते
और कविता झूठ नहीं बोल सकती
अगर वह सचमुच कविता है तो

जिस दौर में
कमज़ोर विपक्ष पर
बनाए जा रहे हों लतीफ़े
और लोग ले रहें हो उसका लुत्फ़
वह कविता विरोधी समय ही है

क्योंकि अब
अदालतों ने कर दिया है
उसी तरह अपराधबोध से मुक्त
जैसा पवित्र नदियों ने डुबकी लगाने के बाद
महाकुम्भ में

अपनी रीढ़ की तिजारत की घोषणा पर
हम ज़ोर-ज़ोर से बजाते हैं ताली

इस कविता विरोधी समय में
हम हँसते हैं अनूप जलोटा के प्रेम पर
यह कहते हुए कि यह ठण्डी पड़ चुकी हसरतों और गर्म जेब का मामला है
यह प्रेम बिकाऊ है
दरअसल यह टिकाऊ नहीं, दिखाऊ है

अब अविश्वसनीय हो चुका है विश्वास
जब विचार
तलवार के बदले ढाल बन जाए
तो वह समय कविता विरोधी हो जाता है

जब सारे अर्थ पहले से तय हों
तब सारे शब्द अपने अर्थ खो देते हैं

जब निष्कर्ष किसी इशारे के इन्तज़ार में हो
जब सत्य की दिशा खेमा तय करता हो
वह कविता विरोधी समय है

हालाँकि तुम्हें होगा इससे इंकार!

क्योंकि
तुम्हें अभी यह तय करना है कि
कविता क्या है तुम्हारे लिए
क्या चमचमाती जूतियों और चमरौंधे जूते के बीच फ़र्क़ नापने का पैमाना

कपड़ा सिलने वाले धागे और पतंग उड़ाने वाले मांझे की दूरी बताने वाला कोई यंत्र

गांधी और मार्क्स के दर्शन की भिड़ंत से पैदा हुई अकर्मण्यता?

यह भी तय करना है अभी
विरोधी कौन है
तुमसे असहमत होने वाला शत्रु
मतान्तर रखने वाला साथी
या तुम्हारे सच से भिन्न तुम्हारा अपरास्त आदिम भय

माना कि
समय बदलते ही बदल जाते हैं सारे समीकरण
फिर भी विरोध से सजती, सँवरती, निखरती
और अन्ततः बनती है कविता

अन्ततः कविता विरोधी समय का जुमला
हाथ से उड़ा तोता है!

चित्र श्रेय: लेखक की फ़ेसबुक वॉल से साभार

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