केशर जाटणी गुलाबी रंग का बूटेदार ओढ़ना
छींट का घेरदार घाघरा पहनकर
बांधकर सिर पर सोने का सात-भरी बोरला
आँखों में काजल या सुरमा भरकर
लेकर हाथों में नसवार की डिबिया
गाँव की गलियों में निकलती
बूढ़े उसे देखकर मूँछों पर ताँव देते थे
लड़के-लड़कियाँ दण्डवत करते
और आसपास गाँवों की सारी औरतें
उससे बातें करना अपना सौभाग्य मानती थीं

आदमी के जन्म से लेकर मरण की यात्रा तक
और तीज-त्यौहार के सारे गीत जानती
कहते हैं कि केशर जाटणी को
पाँच सौ से ज़्यादा गीत
और सौ से ज़्यादा लोककथाएँ मुख ज़ुबानी थीं

गाँव के किसी घर में कोई मांगलिक कार्य
या देवताओं की रात जगानी
या हरजस गाना होता
केशर जाटणी को बुलावा दे भेजते
दस-दस कोसों से बुलावे आते थे
एक कहने पर ही वह
घर का काम-काज बीच में छोड़ चली जाती थी

आँगन के बीचों-बीच बैठकर केशर जाटणी
नसवार सूँघकर और रखकर ठुड्डी पर हाथ
छेड़ती जब गीतों का राग
उसके चारों ओर घेरा डालकर बैठी औरतें
उसके राग में राग मिलातीं
बग़ैर किसी वाद्ययंत्र के
मीठे गीत सुनकर
औरतों के ओढ़नों के फूल सजीव हो जाते
मुरझाये हुए चेहरे खिल-खिल जाते
लड़कियों की ज़वानी उफान मारती
बूढ़ों की पगड़ियाँ थिरकने लगतीं
पेड़-पौधों की डालियाँ लचक-लचक जातीं
गुम्बद पर बैठी कोयल शरमा-शरमा जाती थी

और मरे-खपे के पीछे हरजस गाती
तो उसे नरक न मिलकर
स्वर्ग के द्वार के पट खुल जाते थे

पर अफ़सोस जब केशर जाटणी मरी
सिवाय कोयल के
हरजस गाने वाली कोई नहीं थी
और गाँव उसके फूलों के साथ
उम्र-भर ख़ज़ाने की पोटली गंगा में बहा आया था।

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संदीप पारीक 'निर्भय'
गाँव- पूनरासर, बीकानेर (राजस्थान) | प्रकाशन- हम लोग (राजस्थान पत्रिका), कादम्बिनी, हस्ताक्षर वेब पत्रिका, राष्ट्रीय मयूर, अमर उजाला, भारत मंथन, प्रभात केसरी, लीलटांस, राजस्थली, बीणजारो, दैनिक युगपक्ष आदि पत्र-पत्रिकाओं में हिन्दी व राजस्थानी कविताएँ प्रकाशित। हाल ही में बोधि प्रकाशन जयपुर से 'धोरे पर खड़ी साँवली लड़की' कविता संग्रह आया है।