किस महूरत में दिन निकलता है

Kis Mahurat Mein Din Nikalta Hai, a ghazal by Balswaroop ‘Rahi’

किस महूरत में दिन निकलता है
शाम तक सिर्फ़ हाथ मलता है

वक़्त की दिल्लगी के बारे में
सोचता हूँ तो दिल दहलता है

हमने बौनों की जेब में देखी
नाम जिस चीज़ का सफलता है

तन बदलती थी आत्मा पहले
आजकल तन उसे बदलता है

एक धागे का साथ देने को
मोम का रोम-रोम जलता है

काम चाहे ज़ेह्‌न से चलता हो
नाम दीवानगी से चलता है

उस शहर में भी आग की है कमी
रात-दिन जो धुआँ उगलता है

उसका कुछ तो इलाज करवाओ
उसके व्यवहार में सरलता है

सिर्फ़ दो-चार सुख उठाने को
आदमी बारहा फिसलता है

याद आते हैं शे’र ‘राही’ के
दर्द जब शायरी में ढलता है

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Book by Balswaroop Rahi: