मेरी भूलों से मत उलझो

‘Meri Bhoolon Se Mat Uljho’, a poem by Bhagwati Charan Verma

1

मेरी भूलों से मत उलझो,
जनम-जनम का मैं अज्ञानी।

काँटों से निज राह सजाकर
मैंने उस पर चलना सीखा,
श्वासों में निःश्वास बसाकर
मैंने उस पर पलना सीखा,
गलना सीखा मैंने निशि-दिन
निज आँखों का पानी बनकर
अपने घर में आग लगाकर
मैंने उसमें जलना सीखा।

मुझे नियति ने दे रक्खी है
पागलपन से भरी जवानी।
मेरी भूलों से मत उलझो,
जनम-जनम का मैं अज्ञानी।

2

लगातार मैं पीता जाता,
भरता जाता मेरा प्याला।

मैं क्या जानूँ क्या है अमृत?
क्या मधु है? क्या यहाँ हलाहल?
खारा पानी है सागर का
मीठा-मीठा है गंगाजल।
सुनने को तो सुन लेता हूँ
कड़ुवे-मीठे बोल जगत के,
तड़प-तड़प उठती है बिजली
बरस बरस पड़ते हैं बादल।

कौन पिलाने वाला बोलो?
कौन यहाँ पर पीने वाला?
लगातार मैं पीता जाता,
भरता जाता मेरा प्याला।

3

सीधा-सादा ज्ञान तुम्हारा,
बहकी-बहकी मेरी बातें।

एक तड़प उसकी हर धड़कन
जिसको तुम सब कहते हो दिल,
अरे स्वयम् मैं एक लहर हूँ
मैं क्या जानूँ क्या है साहिल?
मेरे मन में नई उमंगें,
मेरे पैरों में चंचलता।
पिछली मंज़िल छोड़ चुका हूँ,
ज्ञात नहीं है अगली मंज़िल।

सबके सपने अलग-अलग हैं,
यदपि वही हैं सबकी रातें
सीधा-सादा ज्ञान तुम्हारा,
बहकी-बहकी मेरी बातें।

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