मुर्दा भी शोर करता है
ऐसा शोर जिसमें
कान बहरे और ज़बान गूँगी हो जाती है
एक तीव्र सी पीड़ा धरा को छोड़
स्वर्ग तक पहुँचती है
और रिक्त हो जाता है मन ईश्वर का
मुर्दे को सूँघकर पँहुचने वाले हाथ
खेलने लगते हैं भावनाओं से
तो कहर बन जनमानस उमड़ता है
सैलाब की तरह
और
विलीन हो जाता है अँधकार
सुबह आँखें खोलती हैं
काली घनी रात के बाद।

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