‘Muskraaenge Nagphaniyon Mein Khile Phool’, a poem by Saraswati Mishra

ज़िन्दगी एक लम्बी सड़क है
सड़क के दोनों ओर
लम्बी क़तारें हैं नागफनियों की
नागफनियों के काँटों के बीच
खिले हैं तमाम सुर्ख़ फूल

दूर से मन मोहने वाले ये फूल
काँटों की पहरेदारी में पलते हैं
कोमल छुअन की लालसा लिए
प्रतीक्षारत रहते हैं अपनी उम्रभर
अपनी सुगन्ध से खींच लेना चाहते हैं
कठोर नासाओं की घ्राणशक्ति

रिश्तों की नागफनी में अटके हैं
भावनाओं के तमाम रेशे भी
तार-तार हुए ये रेशे प्रतीक्षा में हैं
कि कोमल उँगलियों में फँसी
कुछ जोड़ी सलाइयाँ
उन्हें नये प्रारूप में ढालेंगी
वे नव रूप में मुस्कराएँगे फिर से

कोई तो डालेगा मट्ठा
नागफनियों की जड़ों में
कोई तो कतरेगा नागफनियों में जड़े काँटे
कोई तो बचाएगा काँटों में जकड़े फूल
कोई तो सहेज लेगा हथेलियों पर
इन प्यारे फूलों का रंग
कोई तो भर लेगा अपने भीतर इनकी सुगन्ध
कोई तो महसूसेगा इन फूलों की पीड़ा

इनकी हरीतिमा को सहेजते हुए
खुरच देगा इनका कालापन
काँटों की तीक्ष्णता को बदल देगा
अपनेपन की मधुर चुभन में

तब मुस्कराएँगे नागफनियों में खिले फूल

यह होगा, यह ज़रूर होगा,
आशाएँ सक्षम हैं, नीरस को सरस बनाने में।

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