रात को सोना
कितना मुश्किल काम है

दिन में जागने जैसा भी मुश्किल नहीं

पर, लेकिन तक़रीबन उतना ही

न कोई पत्थर तोड़ा दिन-भर
न ईंट के भट्ठे में कोयला लादा
धान बोयी न ज़मीन सींची
सुइयों में धागे पिरोने में नहीं गँवायी आँख
दिन-भर नहीं सुनी मालिक की गालियाँ
खदान में खाँस-खाँस के नहीं बटोरा खाना
न पीठ को सौ बोरियों का भार है मालूम
जाँघों ने नहीं चखी दो हज़ार मील की टूटन
किसी और के कुत्ते नहीं घुमाए
पख़ाना किसी और का कभी नहीं किया साफ़

नाली में उतरते आदमी को बचपन में देखा था
कौतूहल प्रेरणा प्रशंसा गंदगी—सब एक साथ
एक ही बार जाने जीवन में

सुबह उठ के अख़बार बाँटने नहीं जाना मुझे
दुकान खोल सफ़ाई कर पूजा नहीं निपटानी
मंडी से सब्ज़ी लेने नहीं जाना
न यूनियन की मीटिंग है
न क़र्ज़ अर्ज़ की दरकार है
आदमियों की भोर से पहले शौच नहीं जाना
लम्बा रास्ता नहीं है, ट्रक नहीं चलाना
मेस का नाश्ता नहीं बनाना
दूध दूह के शहर बाँटने जाना नहीं
न रेल का फाटक बंद करने ही जागना है
सोसायटी गेट का ताला भी नहीं खोलना
जो कुर्सी में ही सो जाऊँ

जो सोऊँ
कि उठ सकूँ
ऐसा कोई श्रम तो हो

वरना हराम की रोटी तोड़ने को
यह रात कौन बुरी है
क्या बुरा है जो याद करता हूँ
कॉमरेड अपने से भले-भले
मकड़े जो जाल दूजों के बुनते
अनपढ़ पीयन लाइब्रेरी के
भूखे बावर्ची, चोटिल गुरिला
जागते रहो! उनींदे चौकीदार…

कविता का शीर्षक ग़ालिब के एक शेर से
सहज अज़ीज़ की कविता 'क्रांति: दो हज़ार पचानवे'

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