घिसटते हैं मूल्य
बैसाखियों के सहारे
पुराने का टूटना
नये का बनना
दीखता है—सिर्फ़ डाक-टिकटों पर

लोकतंत्र की परिभाषा
क्या मोहताज होती है
लोक-जीवन के उजास हर्फ़ों की?
तो फिर क्यों दीखते हैं
स्वस्थ सुगठित शब्दों से बने
मूल्यों के पाँव कटे बिम्ब?

नये मूल्यों के प्रतीक हैं
महज़ कुछ उभरे पेट,
कुछ वातानुकूलित घर और
कुछ नये रिश्ते—
चाँद और धरती के,
लेकिन कहाँ हैं
चेहरे पर पसरीं
चन्द अदद पसीने की वे बूँदें
जो मोती के हर्फ़ बनकर
गढ़ती हैं इतिहास,
भूख के कुनबे में
फैलता हुआ ईमानदार विद्रोह
जिसकी बुनियाद
टुच्चे नारे नहीं
बेसब्र होता हुआ श्रम है?

पाश की कविता 'लोहा'

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