परदा

‘Parda’, a poem by Niki Pushkar

ख़ूबसूरत अदाकारा
सुनहरी चकाचौंध से सराबोर
उसकी एक मुस्कान पर
हज़ारों, लाखों युवा दिल
क़ुर्बान हैं
उसके निभाए
एक-एक सशक्त किरदार
नवयुवतियों के लिए हैं
प्रेरणा-श्रोत
परदे पर,
जिसे परिस्थितियाँ,
कभी समझौते पर कमज़ोर नहीं कर पातीं
जिसे अन्याय,
कभी झुका नहीं पाता
जिस पर समाज की कुरीतियाँ,
हावी नहीं हो पातीं
जिसका मनोबल,
कोई कूपमंडूक तोड़ नहीं पाता

वही ख़ूबसूरत अदाकारा,
बड़े बिजनेसमैन प्रेमी द्वारा
‘मेकअप वाली ख़ूबसूरती’ का ताना
सहती है
लाखों दिलों की धड़कन को
बार-बार
अहसास कराया जाता है
उसकी दो कौड़ी की औक़ात
लाखों युवतियों की प्रेरणा
कितनी ही दफ़े
समझौते करती है,
अपने आत्ममसम्मान के साथ
कितनी दफ़े वह तीखे कटाक्षों से
होती है लहुलुहान
कितनी दफ़े तोड़-तोड़ देता है उसे,
अत्यधिक मानसिक तनाव
कितनी दफ़े उबर नहीं पाती वह
गहरे अवसाद से

परदे की सशक्त नायिका,
यकबयक,
बड़ी निरीह और अशक्त हो जाती है
परदे के बाहर….