‘Ghulam Azadi’, a poem by Niki Pushkar

मंगतराम ने दी है
अपनी औरत को आज़ादी
नौकरी करने की

सुबह सवेरे जब मास्टरनी बीवी
चली जाती है स्कूल
मंगतराम दुकान पर जमाता है महफ़िल,
ताश पत्तों संग
ख़ूब हँसी-ठिठोली करता दोस्तों के साथ

रात ठीक आठ बजे
खाना तैयार मिलता उसे
पहले ही बता दिया था उसने कि
नौकरी के साथ
घर का सन्तुलन बना रहना चाहिए

सुबह पत्नी नाश्ता बना
दोपहर के भोजन की तैयारी के साथ
सफ़ाई भी करके जाती है,
इसमें कई दफ़े ख़ुद का नाश्ता
छूट जाता है,
मंगतराम सोया रहता है देर तक

स्कूल के बाद
सरपट दौड़ती बस स्टॉप की ओर कि
कहीं देरी न हो जाए लौटने में
और फिर पति का कोपभाजन न बनना पड़े

वह रात ही कपड़े धोती
अगले दिन के कपड़े इस्त्री करती
सुबह की सब्ज़ी काटकर रखती
रात ही आटा गूँथ देती
फिर देर रात सोती
सुबह सबसे पहले उठ जाती
जल्दी-जल्दी रसोई तैयार करती
आनन-फानन में
दफ़्तर को भागती
कहीं देरी न हो जाए
और फिर बड़े सर के
तंज़ को न झेलना पड़ जाए
मन ही मन डरती

इस तरह,
दोहरी ग़ुलामी करके
आज़ाद है
मंगतराम की पत्नी!

यह भी पढ़ें: सुषमा सक्सेना की कविता ‘माँ का झूठ’

Recommended Book: