पौरुष

‘Paurush’, Hindi Kavita by Rahul Boyal

मयूख होकर फूट पड़ेंगी प्रज्वलित मार्तण्ड से
मेरी संवेदनायें, मुझको कर देंगी भस्म देखना
तुम यूँ ही छिपे रहना अपने पौरुषीय आवरण में
पति न होना, तुम पतित पुरुष ही रहना
और मुझे भी छिपाते रहना स्त्री बनाकर।

निकलने न देना, अपना अहंकार गाड़े रखना
छाती में मुझे केवल तुम रात्रि में रखना
आवरण उतारते दिखता तो होगा
मेरी आत्मा पर चढ़ा हुआ मज़बूत खोल
तुम उतार लेते हो सब कुछ अपनी निर्लज्जताओं से
मेरे वस्त्रों को बनाते हो शस्त्र और
शमशीर सा देते हो टाँक कहीं किसी प्राचीर पे
या प्रक्षेपित करते हो किसी कोने में
जैसै व्यर्थ थी हर एक परत मुझ पर चढ़ी हुई।

श्लील मेरा तुम्हें विवश रखता है
कि तुम कर ही नहीं पाते नष्ट मेरा अस्तित्व
परमेश्वर बनने की जिजीविषा में तुम
मनुष्यता खो बैठते हो, हो जाते हो बस पुरुष
मेरे नयनों का शैथिल्य तुमको ज्ञात ही है
रहता है अर्द्धनिद्रा में, तुम्हें स्फूर्त रखता है
गौर स्कन्द पर तुम्हारा नीलाभ दंतक्षत रहता है
मात्र जीवित मेरी जीवट तृष्णाओं पर
तुम तो हो मृत प्रथम प्रहर से प्रथम रात्रि के।

तुम दिवस में देखना मुझे कवचविहीन
नहीं! केवल निर्वसन ही देखना
और रखना सर्वसम्मुख
और कहना, लगते हो तुम दिवा-रात्रि में सम
कि स्त्री हो तुम, यही रूप है तुम्हारा,
तुम कमतर नहीं हो कदापि मुझसे

तुम कह पाये तो तुम परमेश्वर
और मैं पत्नी ही रहूँगी सर्वदा
और जानते हो तुम
मन, वचन और कर्म से कब फिरी हूँ मैं?

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