इज़्ज़त की बहुत-सी क़िस्में हैं
घूँघट, थप्पड़, गन्दुम
इज़्ज़त के ताबूत में क़ैद की मेख़ें ठोंकी गई हैं
घर से लेकर फ़ुटपाथ तक हमारा नहीं
इज़्ज़त हमारे गुज़ारे की बात है
इज़्ज़त के नेज़े से हमें दाग़ा जाता है
इज़्ज़त की कनी हमारी ज़बान से शुरू होती है
कोई रात हमारा नमक चख ले
तो एक ज़िन्दगी हमें बे-ज़ाइक़ा रोटी कहा जाता है

ये कैसा बाज़ार है
कि रंग-साज़ ही फीका पड़ा है
ख़ला की हथेली पे पतंगें मर रही हैं
मैं क़ैद में बच्चे जनती हूँ
जाएज़ औलाद के लिए ज़मीन खिलन्दड़ी होनी चाहिए
तुम डर में बच्चे जनती हो इसीलिए आज तुम्हारी कोई नस्ल नहीं

तुम जिस्म के एक बन्द से पुकारी जाती हो
तुम्हारी हैसियत में तो चाल रख दी गई है
एक ख़ूबसूरत चाल
छोटी मुस्कुराहट तुम्हारे लबों पे तराश दी गई है
तुम सदियों से नहीं रोयीं
क्या माँ ऐसी होती है

तुम्हारे बच्चे फीके क्यों पड़े हैं
तुम किस कुनबे की माँ हो
रेप की, क़ैद की, बटे हुए जिस्म की
या ईंटों में चुनी हुई बेटियों की

बाज़ारों में तुम्हारी बेटियाँ
अपने लहू से भूख गूँधती हैं
और अपना गोश्त खाती हैं
ये तुम्हारी कौन-सी आँखें हैं
ये तुम्हारे घर की दीवार की कौन-सी चिनाई है
तुम ने मेरी हँसी में तआरुफ़ रक्खा
और अपने बेटे का नाम सिक्का-ए-राइज-उल-वक़्त

आज तुम्हारी बेटी अपनी बेटियों से कहती है
मैं अपनी बेटी की ज़बान दाग़ूँगी
लहू थूकती औरत धात नहीं
चूड़ियों की चोर नहीं
मैदान मेरा हौसला है
अंगारा मेरी ख़्वाहिश
हम सर पे कफ़न बाँधकर पैदा हुए हैं
कोई अँगूठी पहन कर नहीं
जिसे तुम चोरी कर लोगे!

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सारा शगुफ़्ता
(31 अक्टूबर 1954 - 4 जून 1984) सारा शगुफ़्ता पाकिस्तान की एक बनेज़ीर शायरा थीं। 1980 में जब वह पहली और आख़िरी बार भारत आयी थीं तो दिल्ली के अदबी हल्क़ों में उनकी आमद से काफ़ी हलचल मच गयी थी। वह आम औरतों की तरह की औरत नहीं थीं। दिल्ली के कॉफी हाउस मोहनसिंह प्लेस में मर्दों के बीच बैठकर वह विभिन्न विषयों पर बहस करती थीं। बात-बात पर क़हक़हे लगाती थीं। पर्दे की सख़्त मुख़ालिफ़त करती थीं और नारी स्वतन्त्रता के लिए आवाज़ बुलन्द करती थीं। यही नहीं वह आम शायरात की तरह शायरी भी नहीं करती थीं। ग़ज़लें लिखना और सुनना उन्हें बिल्कुल पसन्द न था। छन्द और लयवाली नज़्मों से भी उन्हें कोई लगाव नहीं था। वह उर्दू की पहली ‘ऐंग्री यंग पोएट्स’ थीं और ऐंगरनैस उनकी कविता की पहली और आख़िरी पहचान कही जा सकती है।