ये हॉस्टल के बच्चे आशिक़ मिज़ाज
खोजें कंघी से ज़ुल्फ़ों में इश्क़ इलाज
दिन में पार्कों अर बागों में हैं पाए जाते
मुस्काते, शरमाते, झगड़ते, झपटते
लिपट जोड़ीदारों की गोद में पड़े,
झाड़ों के पीछे, छाँव के नीचे
लिपट आज इधर-उधर, कल किस,
आते गार्डों को देख होते दूर-दूर खड़े।
मॉलों के बाशिंदे, ये डोसा दरिंदे
सिनेमा हॉलों में इट्ठलाते
ख़ुद को हीरो बताते
शॉपिंग को जाते।
विश्वविद्यालय के बाज़ारों में आशिक़ी
का मज़ा, टकराती उंगलियों में
साझा चुस्कियों में, उस कुल्फी की
जिसकी बूंदें कभी आशिक़ के जूते पे
गिर जाती हैं, तो कह देता है
भीना मुस्का तभी कि ‘कोई बात नहीं’।

ये हॉस्टल के बच्चे आशिक़ मिज़ाज
जिनकी आंखों में फूहड़ सारा समाज
इनके कमरों की दुनिया अंधेरी-सी
दिन की धूपों के ख़्वाब रोशनदान
लाजवाब जुगनू ये हॉस्टल के बच्चे
फ़ोनों पे करते उल्फ़त क़रार
कमरों से रात भर रहते फ़रार
सोने से पहले भी लेते बाल सँवार।

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सहज अज़ीज़
नज़्मों, अफ़सानों, फ़िल्मों में सच को तलाशता बशर। कला से मुहब्बत करने वाला एक छोटा सा कलाकार।