पिता और व्हीलचेयर

‘Pita Aur Wheelchair’, a poem by Nirmal Gupt

पिता व्हीलचेयर पर बैठे थे
एकदम इत्मिनान के साथ,
उनके अलावा सबको पता था
वह हो सकते हैं वहाँ से
किसी पल भी लापता
मौत यहीं कहीं है आसपास

वह बार-बार कर रहे थे
बर्मा ले चलने की ज़िद
बड़ी आत्मीयता से ज़िक्र करते
लाहौर की पेचीदा गलियों का
द्वितीय विश्व युद्ध के क़िस्से
अनवरत दोहराते

वह आश्वस्त थे
हमेशा की तरह
एक बार यहाँ से चले भी गये,
लौट आएँगे आस्तीन से पसीना पोंछते
उनको कभी नहीं रही
कहीं आने-जाने की जल्दी

वह आँखें मूँदे थे
माँ हताशा में ले रही थी
लम्बी-लम्बी साँसें
खंगाल रही थी शायद
आख़िरी बार या पहली बार अनमनी-सी
उनसे रूठ जाने की पुख़्ता वजह

उन्होंने पूछा था
तब हम सबसे या
कमरे की नम हवा से
यार, वह स्टीफ़न हॉकिंग की
ख़ुद-ब-ख़ुद चलने वाली व्हीलचेयर
क्या अब मिलने लगी है बुध बाज़ार में

वह बिना हिले-डुले बैठे थे
बैठे ही रहे देर तक
हम लोगों को मालूम नहीं था
उनके सवाल का जवाब
तभी वह चले गए चुपचाप
व्हीलचेयर वहीं छोड़कर।

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