भूल जाते हैं

अक्सर घर से निकलते हुए
लोग भूल जाते हैं
बत्तियाँ बुझाना और नल बन्द करना

दुकानों पर भूल जाते हैं
साबुन या तेल की शीशी
या नमक का पैकेट ही

सब्ज़ियों के ठेलों पर
भूल जाते हैं
मिर्च के साथ धनिए की तुकबन्दी

दोस्तों के घर
भूल जाते हैं
किताबें, बैग, पर्स, घड़ी, चश्मा

मन्दिरों के बाहर
चप्पलों के साथ भूल जाते हैं
अपना असली चेहरा

ऊँचाइयों पर पहुँचते हैं
और भूल जाते हैं
बीता हुआ समय

काम पर जाते हैं और
चौखट पर ही
भूल जाते हैं
अपनी आत्मा।

देश

तुम जानते थे
शरीर बनाने के लिए
आत्मा गलानी पड़ती है

इसलिए तुमने देश को बनाने पर इतनी मेहनत की
कि उसकी आत्मा गाय के पेशाब-सी
इधर-उधर बहने लगी है

अब तुम चाहो तो उसे पीकर अपनी व्याधियों से मुक्त हो जाओ।

क्या है रेल!

रेल!
खट-खट करती चली गयी
और सूने प्लेटफ़ॉर्म पर छोड़ गयी थोड़ी गर्माहट, थोड़े स्पन्दन

रेल एक जादू है
आती है और सैकड़ों लोग
ग़ायब हो जाते हैं!

गाँवों से गुज़रती है तो आज भी कौतूहल होती है
छोटे बच्चों के हिलते हाथों का जवाब पों की आवाज़ से देती है
नदियों से गुज़रती है तो ख़ुशी में हिल उठता है पानी
जंगलों से गुज़रते हुए पूछ लेती है उनका हाल
दुःखी होती है कल ही काटे गए पेड़ों के लिए
ग़ायब हुए हिरन और न लौटे परिंदों के लिए
शहरों से गुज़रती है तो बीमार लोगों को देख जी भर उठता है उसका

इसके इतर रेल उन लोगों के लिए भी कुछ है
जिनकी नसों में ख़ून की जगह बहने लगी है ऊब
जिनकी ज़िन्दगी और न ढोने वाले बोझ जैसी हो गई है
जो इतने अकेले हैं, इतने कि कुचले जाने पर भी आवाज़ नहीं करते
उनके लिए भी रेल कुछ तो है
क्या है रेल… जादू, त्रास, दवा…
या कुछ और।

बन्दूक़ें

1

जिसके भी हाथ में जातीं
बदल देतीं उसकी पहचान,
दुनिया की कहानियों में
बदल देतीं उसकी जगह

बन्दूक़ें जो बनने से नष्ट होने तक
पड़ी रहीं हाथों में ही
कितना कुछ बदल दिया उन्होंने
वहीं पड़े-पड़े।

बच्चों के हाथ रहीं
तो खिलौना बन गयीं
सयानों के हाथ पड़ीं
तो मृत्यु साबित हुईं

मजलूमों के हाथों में गयीं
तो जंगल, नदी, खेत
और घर बन गयीं

आतताइयों के हाथ जाते ही
अफ़वाहों की तरह
निगल गयीं पूरा का पूरा शहर।

बच्चे मेले से लाए उन्हें
और बना लिया उन्हें अपना दोस्त
फिर एक दिन जब
तड़तड़ाहट की असंख्य आवाज़ों के साथ
हिल गया पूरा क़स्बा
चिड़िया छोड़कर उड़ गयीं अपना पेड़
ठीक उसी वक़्त बच्चे
अपने पिताओं की टूटी रक्ताभ घड़ियाँ उठाएँ
चीख़कर धिक्कार रहे थे ख़ुद को
बन्दूक़ों का दोस्त बन जाने के लिए।

4

लोहार ने ही दी उन्हें कठोरता
लोहार ने ही दिया अपना रंग
लोहार ने ही दी अपने हिस्से की निर्भीकता
अपने हिस्से की टंकार भरी उनमें
और अपने हिस्से का संघर्ष भी सौंप दिया उनको
लेकिन! लोहार ने तो नहीं दिया उन्हें
ग़रीब भूखे लोगों की जान लेने का प्रशिक्षण

शायद बिक जाने के बाद बन्दूक़ों ने सीख लिया
बहुत कुछ…।

5

मामा! मामा! बन्दूक़ दिलाओ न…
मामा ने उसे दिला दी बन्दूक़
उसके किर्र…किर्र…और फट…फट… से
बच्चा भगाता था बन्दर और उड़ जाते थे पक्षी
आज पच्चीस साल बाद
लड़का भगाता है आदमी और उड़ जाते हैं उसके परखच्चे।

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शिवम चौबे
बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से स्नातक। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में परास्नातक। फिलहाल अध्ययनरत। कविताएँ लिखने पढ़ने में रूचि। संपर्क- [email protected]

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